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षडावश्यकाधिकार ७। २५३ आगे षडावश्यक चूलिकाको कहते हैं;सवावासणिजुत्तो णियमा सिद्धोत्ति होइ णायव्वो। अह णिस्सेसं कुणदि ण णियमा आवासया होंति६८४ सर्वावश्यकनियुक्तः नियमात् सिद्ध इति भवति ज्ञातव्यः । अथ निश्शेषाणि करोति न नियमात् आवासका भवंति६८४
अर्थ-सब आवश्यकोंकर उद्यमी साधु नियमसे सिद्ध होता है ऐसा जानना और जो सब आवश्यकोंको नहीं करे तो उसके नियमसे स्वर्गादिमें आवास होता है ॥ ६८४ ॥ आवासयं तु आवासयेसु सव्वेसु अपरिहीणेसु । मणवयणकायगुत्तिदियस्स आवासया होंति ॥ ६८५॥
आवासनं तु आवश्यकेषु सर्वेषु अपरिहीनेषु । मनोवचनकायगुप्तेद्रियस्य आवश्यका भवंति ॥ ६८५॥
अर्थ-मन वचन कायकर गुप्त (रक्षित) हैं इंद्रिय जिसकीं ऐसे मुनिके संपूर्ण सब आवश्यकोंमें जो यत्नकर स्थिति वह परमार्थसे आवश्यक होते हैं । अन्य आवश्यक कर्मागमके कारण हैं।६८५॥ तियरण सव्वविसुद्धो दव्वं खेत्ते जथुत्तकालमि। मोणेणव्वाखित्तो कुजा आवासया णिचं ॥ ६८६ ॥ त्रिकरणः सर्वविशुद्धः द्रव्ये क्षेत्रे यथोक्तकाले । मौनेनाव्याक्षिप्तः कुर्यादावश्यकानि नित्यं ॥ ६८६ ॥
अर्थ-मन वचन कायकरके सर्वथा शुद्ध, द्रव्य क्षेत्र यथोक्तकालमें नित्य ही मौनकर निराकुल हुआ साधु आवश्यकोंको करे॥ जो होदि णिसीदप्पा णिसीहिया तस्स भावदो होदि। अणिसिद्धस्स णिसीहियसबो हवदि केवलं तस्स६८७