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________________ २५२ मूलाचार प्रकार जिनशासनमें मानागया सब संकल्प है उसको शुभध्यान तुम जानो ।। ६७८-६८० तक ॥ परिवारइड्डिसक्कारपूयणं असणपाणहेऊ वा । लयणसयणासणं भत्तपाणकामट्ठहेऊ वा ॥ ६८१ ॥ आज्ञाणिद्देसमाणकित्तीवण्णणपहावणगुणङ्कं । झाणमिणमप्पसत्थं मणसंकप्पो द वीसत्थो । ६८२ ॥ परिवारऋद्धिसत्कारपूजनं अशनपानहेतोर्वा । लयनशयनासनभक्तपानकामार्थहेतोर्वा ।। ६८१ ॥ आज्ञानिर्देशप्रमाणकीर्तिवर्णन प्रभावनगुणार्थं । ध्यानमिदमप्रशस्तं मनः संकल्पस्तु विश्वस्तः ॥ ६८२ ॥ अर्थ – पुत्रशिष्यादिके लिये, हाथी आदिकेलिये, आदरकेलिये, पूजनकेलिये, भोजनपानके लिये, खुदी हुई पर्वतकी जगह, शयन, आसन, भक्ति, दशप्रकारके प्राण, मैथुनकी इच्छा अर्थ इनकेलिये, आज्ञा, निर्देश, प्रमाणीकता, कीर्तिका वर्णन, प्रभावना गुणविस्तार – इनके लिये कायोत्सर्ग करे तो ऐसा मनका संकल्प अशुभ ध्यान है ॥ ६८१-६८२ ॥ काउस्सग्गणिजुत्ती एसा कहिया मए समासेण । संजमत वड्डियाणं णिग्गंधाणं महरिसीणं ॥ ६८३ ॥ कायोत्सर्गनिर्युक्तिः एषा कथिता मया समासेन । संयमतपऋद्धिकानां निग्रंथानां महर्षीणां ॥ ६८३ ॥ अर्थ – संयम और तपकी वृद्धिको चांहनेवाले निर्बंथ महामु नियोंको मैंने यह कायोत्सर्गनियुक्ति संक्षेपसे कही है ॥ ६८३ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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