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________________ षडावश्यकाधिकार ७ । २४९ निष्ठीवनमंगामर्श कायोत्सर्गे वर्जयेत् ॥ ६७० ॥ अर्थ-दिशाओंकी तरफ देखना, गर्दनि ( नारि ) का ऊंचा करना, नारिका नमाना, थूकना, शरीरका मसलना-इतने दोषोंको भी कायोत्सर्ग-अवस्थामें त्यागे ॥ ६७० ॥ णिकूडं सविसेसं बलाणुरुवं वयाणुरूवं च । काओसग्गं धीरा करंति दुक्खक्खयहाए ॥ ६७१॥ निःकूटं सविशेष बलानुरूपं वयोनुरूपं च ।' कायोत्सर्ग धीराः कुर्वति दुःखक्षयार्थम् ॥ ६७१ ॥ अर्थ-मायाचारीसे रहित, विशेषकर सहित, अपनी शक्तिके अनुसार, बाल आदि अवस्थाके अनुकूल धीरपुरुष दुःखके क्षयके लिये कायोत्सर्ग करते हैं ॥ ६७१ ॥ जो पुण तीसदिवरिसो सत्तरिवरिसेण पारणाय समो। विसमो य कूडवादी णिविण्णाणी य सोय जडो॥६७२ यः पुनः त्रिंशद्वर्षः सप्ततिवर्षेण पारणेन समः। विषमश्च कूटवादी निर्विज्ञानी च स च जडः ॥ ६७२ ॥ अर्थ-जो तीसवर्षप्रमाण यौवन अवस्थावाला समर्थ सत्तरि वर्षवाले शक्ति-रहित वृद्धके साथ कायोत्सर्गकी पूर्णताकरके समान रहता है वृद्धकी बराबरी करता है वह साधु शांतरूप नहीं है मायाचारी है विज्ञानरहित है। चारित्ररहित है और मूर्ख है । उहिदउट्ठिद उहिदणिविट्ठ उवविठ्ठउढिदो चेव । उपविट्ठणिविट्ठोवि य काओसग्गो चदुट्ठाणो ॥ ६७३॥ उत्थितोत्थित उत्थितनिविष्ट उपविष्टोत्थितश्चैव । उपविष्टनिविष्टोपि च कायोत्सर्गः चतुःस्थानः ॥ ६७३ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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