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________________ षडावश्यकाधिकार ७। २४७ जानकर धीरपुरुष अतिशयकर दुःखके क्षयनिमित्त कायोत्सर्गमें तिष्ठते हैं ॥ ६६३ ॥ काओसग्गमि ठिदो चिंतिदु इरियावधस्स अतिचारं। तं सव्वं समाणित्ता धम्मं सुकं च चिंतेन्जो ॥ ६६४ ॥ कायोत्सर्गे स्थितः चिंतयन् ईयोपथस्य अतीचारं । तं सर्व समानीय धर्म शुक्लं च चिंतयतु ॥ ६६४ ॥ अर्थ-कायोत्सर्गमें तिष्ठा, ईर्यापथके अतीचारके नाशको चितवन करता मुनि उन सब नियमोंको समाप्तकर धर्मध्यान और शुक्लध्यानका चितवन करो ॥ ६६४ ॥ तह दिवसियरादियपक्खियचदुमासिवरिसचरिमेसु । तं सव्वं समाणित्ता धम्म सुक्कं च झायेजो ॥ ६६५ ॥ तथा दैवसिकरात्रिकपाक्षिकचतुर्मासवर्षचरमान् । तं सर्व समाप्य धर्म शुक्लं च ध्यायेत् ॥ ६६५ ॥ अर्थ-इसीप्रकार दैवसिक रात्रिक पाक्षिक चतुमासिक वार्षिक उत्तमार्थ-इन सब नियमोंको पूर्णकर धर्मध्यान और शुक्लध्यानको ध्यावे ॥ ६६५॥. . काओसग्गमि कदे जह भिजदि अंगुवंगसंधीओ। तह भिजदि कम्मरयं काउस्सग्गस्स करणेण ॥६६६॥ .. कायोत्सर्गे कृते यथा भियंते अंगोपांगसंधयः । तथा भिद्यते कर्मरजः कायोत्सर्गस्य करणेन ॥ ६६६ ॥ अर्थ-कायोत्सर्ग करनेपर जैसे अंग उपांगोंकी संधियांभिद जाती हैं उसीतरह कायोत्सर्गके करनेसे कर्मरूपी धूलि अलग होजाती है ॥ ६६६ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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