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________________ २४६ मूलाचारजानेकेबाद, जिननिर्वाणभूमि आदि अर्हतशय्या निषद्यकाका स्थान श्रमण शय्या इनमें, दीर्घशंका लघुशंका करनेके बाद-इन सबके कायोत्सर्गमें पच्चीस पच्चीस उच्छ्रास होते हैं ॥ ६६० ॥ उद्देसे णिदेसे सज्झाए वंदणेय परिधाणे । सत्तावीसुस्सासा काओसग्गह्मि कादवा ॥ ६६१ ॥ उद्देशे निर्देशे स्वाध्याये वंदनायां प्रणिधाने । सप्तविंशतिरुच्छ्वासाः कायोत्सर्गे कर्तव्याः ॥ ६६१ ॥ अर्थ-ग्रंथादिके आरंभमें, पूर्णताकालमें, खाध्यायमें, वंदनामें, अशुम परिणाम होनेमें जो कायोत्सर्ग उसमें सत्ताईस उच्छ्रास करने योग्य हैं ॥ ६६१ ॥ काओसग्गं इरियावहादिचारस्स मोक्खमग्गम्मि। वोसट्टचत्तदेहा करंति दुक्खक्खयहाए ॥ ६६२॥ कायोत्सर्ग ईर्यापथातिचारस्य मोक्षमार्गे । व्युत्सृष्टत्यक्तदेहाः कुर्वति दुःखक्षयार्थं ॥ ६६२ ॥ अर्थ-ईर्यापथके अतीचारको सोधनेकेलिये मोक्षमार्गमें स्थित शरीरमें ममत्वको छोड़नेवाले मुनि दुःखके नाश करनेकेलिये कायोत्सर्ग करते हैं ॥ ६६२ ॥ भत्ते पाणे गामंतरे य चदुमासिवरिसचरिमेसु । णाऊण ठंति धीरा घणिदं दुक्खक्खयहाए ॥ ६६३ ॥ भक्तं पानं ग्रामांतरं च चातुर्मासिकवार्षिकचरमान् । ' ज्ञात्वा तिष्ठति धीरा अत्यर्थ दुःखक्षयार्थम् ॥ ६६३ ॥ अर्थ-भक्त पान ग्रामांतर चतुर्मासिक वार्षिक उत्तमार्थ-इनको
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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