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________________ षडावश्यकाधिकार ७। २४३ अंतर है ऐसे समपाद, सब हाथ आदि अंगोंका चलना जिसमें नहीं है वह शुद्ध कायोत्सर्ग है ॥ ६५० ॥ मुक्खट्ठी जिदणिद्दो सुत्तत्थविसारदो करणसुद्धो। आदबलविरियजुत्तो काउस्सग्गी विसुद्धप्पा ॥६५१॥ मोक्षार्थी जितनिद्रः सूत्रार्थविशारदः करणशुद्धः। आत्मबलवीर्ययुक्तः कायोत्सर्गी विशुद्धात्मा ॥ ६५१ ॥ अर्थ-मोक्षार्थी, जिसने निद्राको जीत लिया है, सूत्र और अर्थ इनमें निपुण, परिणामोंकर शुद्ध, अपना शारीरिक बल तथा आत्मबलकर सहित विशुद्ध आत्मावाला ऐसा कायोत्सर्गी जानना चाहिये । ६५१ ॥ काउस्सग्गं मोक्खपहदेसयं घादिकम्म अदिचारं । इच्छामि अहिहादुं जिणसेविद देसिदत्तादो॥ ६५२॥ कायोत्सर्ग मोक्षपथदेशकं घातिकर्म अतिचारं । इच्छामि अधिष्ठातुं जिनसेवितं देशितस्तस्मात् ॥ ६५२ ॥ अर्थ-यह कायोत्सर्ग सम्यग्दर्शनादि मोक्षमार्गका उपकारी है घातियाकर्मोंका नाशक है उसको खीकार करना चाहता हूं क्योंकि यह जिनेंद्रदेवने सेवन किया है और उपदेशा है ॥ ६५२ ॥ एगपदमस्सिदस्सवि जो अदिचारो दु रागदोसेहिं । गुत्तीहिं वदिकमो वा चदुहिं कसाएहिं व वदेहि।।६५३ छन्जीवणिकाएहिं भयमयठाणेहिं बंभधम्महि । काउस्सग्गं ठामिय तं कम्मणिघादणट्ठाए ॥ ६५४ ॥ एकपदमाश्रितस्यापि यः अतीचारस्तु रागद्वेषाभ्यां । गुप्तीनां व्यतिक्रमो वा चतुर्भिः कषायैः वा व्रतेषु ॥६५३॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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