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________________ षडावश्यकाधिकार ७ । २१३ द्रव्योद्योतः अग्निः चंद्रः सूर्यो मणिश्चैव ।। ५५२ ॥ अर्थ — प्रकाशके दो भेद हैं द्रव्य भाव । अग्नि चंद्रमा सूर्य रत्न ये सब द्रव्यउद्योत हैं ॥ ५५२ ॥ भावज्जोवो णाणं जह भणियं सव्वभावद रिसीहिं । तस्सदुपयोगकरणे भावुज्जोवोति णादव्वो ॥ ५५३ ॥ भावोद्योतो ज्ञानं यथा भणितं सर्वभावदर्शिभिः । तस्य तु उपयोगकरणे भावोद्योत इति ज्ञातव्यः ॥ ५५३ ॥ अर्थ - ज्ञान है वही भावउद्योत है ऐसा केवली भगवानने कहा है । उस ज्ञानके उपयोग करनेसे खपरप्रकाशपना है इसीलिये वह ज्ञान भावउद्योत है ऐसा जानना ।। ५५३ ॥ पंचविहो खलु भणिओ भावुज्जोवो य जिणवरिंदेहिं । आभिणिओहियसुदओहिणाणमणकेवलं णेयं ॥ ५५४॥ पंचविधः खलु भणितः भावोद्योतश्च जिनवरेंद्रैः । आभिनिबोधिकश्रुतावधिज्ञानमनः केवलं ज्ञेयं ।। ५५४ ॥ अर्थ - जिनदेवने भावोद्योतके पांच भेद कहे हैं-मति श्रुत अवधि मनःपर्यय केवलज्ञान | ऐसा जानना || ५५४ ॥ दब्वज्जोवोजोवो पsिहण्णदि परिमिदमि खेत्तम । भावज्जोवोजोवो लोगालोगं पयासेदि ।। ५५५ ॥ द्रव्योद्योतः उद्योतः प्रतिहन्यते परिमिते क्षेत्रे । भावोद्योत उद्योतः लोकालोकं प्रकाशयति ॥ ५५५ ॥ अर्थ- द्रव्योद्योतरूप उद्योत अन्य द्रव्यसे रुक जाता है और परिमित ( मर्यादारूप ) क्षेत्रमें रहता है तथा भावोद्योतरूपी उद्योत लोक अलोक सबको प्रकाशता है किसीसे रुकता नहीं५५५
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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