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________________ २१२ मूलाचारणिययभवे वदंता भवलोगं तं विजाणाहि ॥ ५४९॥ ..नारकदेवमनुष्यतिर्यग्योनिं गताश्च ये सत्त्वाः। निजभवे वर्तमाना भवलोकं तं विजानीहि ॥ ५४९ ॥ अर्थ-नारक देव मनुष्य तियेच योनिमें प्राप्त हुए और अपने वर्तमान पर्यायमें प्राप्त जो जीव उनको भवलोक जानना५४९ तिवो रागो य दोसो य उदिण्णा जस्स जंतुणो। . भावलोगं वियाणाहि अणंतजिणदेसिदं ॥ ५५०॥ तीतो रागश्च द्वेषश्च उदीर्णा यस्य जंतोः। भावलोकं विजानीहि अनंतजिनदेशितं ॥ ५५० ॥ अर्थ-जिस जीवके अत्यंत राग द्वेष उदयको प्राप्त हों वह भावलोक है ऐसा जिनदेवने कहा है ॥ ५५० ॥ दव्वगुणवेत्तपन्जय भावाणुभावो य भावपरिणामो। जाण चउव्विहमेयं पजयलोगं समासेण ॥५५१॥ द्रव्यगुणक्षेत्रपर्यायाः भावानुभावश्च भावपरिणामः । जानीहि चतुर्विधमेवं पर्यायलोकं समासेन ॥५५१ ॥ अर्थ-द्रव्यों के ज्ञानादिगुण, क्षेत्रोंके वर्ग नरक भरत क्षेत्र आदि पर्याय, आयुके जघन्य आदि भेद, शुभाशुभ असंख्याते परिणाम-इसतरह द्रव्यगुण १ क्षेत्रपर्याय २ भावानुभाव ३ भावपरिणाम ४ इन चारोंको संक्षेपसे पर्यायलोक जानना ॥ ५५१ ॥ ___ आगे उद्योतका खरूप कहते हैं;उज्जोवो खलु दुविहो णादवो दव्वभावसंजुत्तो। दव्वुजोवो अग्गी चंदो सूरो मणी चेव ॥ ५५२ ॥ . उद्योतः खलु द्विविधः ज्ञातव्यः द्रव्यभावसंयुक्तः।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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