SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 236
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ षडावश्यकाधिकार ७। १९९ अग्निकर कर्म बंधके नाश होनेपर तपाने योग्य होके शुद्ध धातुरूप सिद्धपको प्राप्त होता है ॥ ५०८ ॥ सदा आयारबिद्दण्ड सदा आयरियं चरे । आयारमायारवंतो आयरिओ तेण उच्चदे ॥ ५०९ ॥ सदा आचारवित् सदा आचरितं चरः । आचारमाचारयन् आचार्यः तेन उच्यते ।। ५०९ ॥ अर्थ – जो सर्वकाल संबंधी आचारको जाने, हमेशा आचरण योग्यको आचरण करता हो और अन्य साधुओंको आचरण कराता हो इसलिये वह आचार्य कहा जाता है ॥ ५०९ ॥ जम्हा पंचविहाचारं आचरंतो पभासदि । आयरियाणि देतो आयरिओ तेण उच्चदे ॥ ५१० ॥ यस्मात् पंचविधाचारं आचरन् प्रभासते । आचरितानि दर्शयन् आचार्यः तेन उच्यते ।। ५१० ॥ अर्थ - जिसकारण पांच प्रकारके आचरणोंको पालता हुआ शोभता है और आपकर किये आचरण दूसरोंको भी दिखाता है उपदेश करता है इसलिये वह आचार्य कहा जाता है ॥ ५१० ॥ बारसंगं जिणक्खादं सज्झायं कथितं बुधें । उवदेसइ सज्झायं तेणुवज्झाउ उच्चदि ॥ ५११ ॥ द्वादशांगानि जिनाख्यातानि स्वाध्यायः कथितो बुधैः । उपदिशति स्वाध्यायं तेनोपाध्याय उच्यते ॥ ५११ ॥ अर्थ – बारह अंग चौदहपूर्व जो जिनदेवने कहे हैं उनको पंडितजन स्वाध्याय कहते हैं । उस स्वाध्यायका जो उपदेश करता है इसलिये वह उपाध्याय कहलाता है ।। ५११ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy