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पंचाचाराधिकार ५। अर्थ–उपशांतकषायगुणस्थानवाला जीव पृथक्त्ववितर्कवीचार नामा शुक्लध्यानको ध्याता है और क्षीणकषायगुणस्थानवाला एकत्ववितर्कवीचार नामा दूसरे शुक्लध्यान का चितवन करता है॥४०॥ मुहुमकिरियं सजोगी झायदि झाणं च तदियसुकं तु। जं केवली अजोगी झायदि झाणं समुच्छिण्णं ४०५ सूक्ष्मक्रियं सयोगी ध्यायति ध्यानं च तृतीयशुक्लं तु । यत् केवली अयोगी ध्यायति ध्यानं समुच्छिन्नं ॥४०५॥
अर्थ-सूक्ष्मकायक्रियाप्रतिपाति नामक तीसरे शुक्लध्यानको सयोग केवली ध्याते हैं और समुच्छिन्नक्रिय नामके चौथे शुक्लध्यानको अयोगकेवली ध्याते हैं ॥ ४०५ ॥
आगे व्युत्सर्गतपका निरूपण करते हैं;दुविहो य विउस्सगो अब्भंतर बाहिरो मुणेयव्वो। अन्भंतर कोहादी बाहिर खेत्तादियं दव्वं ॥ ४०६ ॥ द्विविधश्च व्युत्सर्गः आभ्यंतरो बाह्यः ज्ञातव्यः । अभ्यंतरः क्रोधादिः बाह्यः क्षेत्रादिकं द्रव्यं ॥ ४०६ ॥
अर्थ-परिग्रहत्यागरूप व्युत्सर्गतप दो प्रकारका है एक अभ्यंतर दूसरा बाह्य । क्रोधादिका त्याग होना अभ्यंतर व्युत्सर्ग है
और क्षेत्रादि बाह्यद्रव्यका त्याग वह बाह्य व्युत्सर्ग है ॥ ४०६ ॥ मिच्छत्तवेदरागा तहेव हस्सादिया य छद्दोसा। चत्तारि तह कसाया चोद्दस अब्भंतरा गंथा ॥४०७॥ मिथ्यात्ववेदरागा तथैव हास्यादिकाश्च पदोषाः। चत्वारः तथा कषायाः चतुर्दश आभ्यंतरा ग्रंथाः॥४०७॥ अर्थ-मिथ्यात्व, तीन वेद (स्त्री आदि), राग, हास्य आदि
११ मूला०