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________________ १६० मूलाचार पाचनरूप उदीरणा, अन्यप्रकृतिरूपपरिणमन, बंध इनका तथा कर्मों के छूटनेका विचार करना वह विपाकविचयनामा धर्मध्यान है ॥ ४०१ ॥ उड्डमहतिरियलोए विचिणादि सपज्जए ससंठाणे । एत्थेव अणुगदाओ अणुपेक्खाओ य विचिणादि ४०२ . ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्लोकान् विचिनोति सपर्यायान् ससंस्थानान् । अत्रैवानुगता अनुप्रेक्षाश्च विचिनोति ॥ ४०२ ॥ अर्थ-पटल इंद्रक श्रेणीबद्ध प्रकीर्णकादि पर्यायोसहित त्रिकोन चतुष्कोण गोल आयत मृदंगाकाररूप आकारोंसहित ऊर्ध्वलोक अधोलोक तथा मध्यलोकका चितवनकरे तथा इसीमें प्राप्त बारह भावनाओंका चितवनकरे वह संस्थानविचय धर्मध्यान है॥ ४०२॥ अद्धवमसरणमेगत्तमण्णसंसारलोगमसुचित्तं ॥ आसवसंवरणिजरधम्मं बोधि च चिंतिजो॥४०३ ॥ अध्रुवमशरणमेकत्वमन्यत्वसंसारलोकमशुचित्वं । आस्रवसंवरनिर्जराधर्मो बोधिश्च चिंत्यः ॥४०३॥ अर्थ-अनित्य अशरण एकत्व अन्यत्व संसार लोक अशुचित्व आस्रव संवर निर्जरा धर्म बोधि ( सम्यक्त्वसहित ) भावनाइन बारहभावनाओंका चितवन करना चाहिये ॥ ४०३ ॥ उवसंतो दु पुहत्तं झायदि झाणं विदक्कवीचारं । खीणकसाओ झायदि एयत्तविदकवीचारं ॥ ४०४ ॥ उपशांतस्तु पृथक्त्वं ध्यायति ध्यानं वितर्कवीचारं । क्षीणकषायो ध्यायति एकत्ववितकेवीचारं ॥ ४०४॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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