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मूलाचारसाधुसमूहमें, गुरुकुलमें, चातुवर्णसंघमें, सुखी उपद्रव्यरहितमें और उपद्रव होनेपर, वैयावृत्त्य (टहल ) करना योग्य है ॥ ३९० ॥ सेन्जोग्गासणिसजा तहोवहिपडिलेहणाहि उवग्गहो। आहारोसहवायणणिकिंचणं वंदणादीहिं॥ ३९१ ॥ शय्यावकाशनिषद्या तथा उपधिप्रतिलेखनाभिः उपगृहः । आहारौषधवाचनाविकिंचनवंदनादिभिः ॥ ३९१ ।। अर्थ-शय्या, वसतिका, आसन, कमंडलु आदि, पीछी आदि इनकर तथा भिक्षाचर्या, सोंठ आदि औषध, शास्त्रव्याख्यान, मलका त्याग और वंदना आदि-इन सब उपायोंसे उपकार करना चाहिये ॥ ३९१ ॥ अद्धाणतेणसावदरायणदीरोधणासिवे ओमे । वेजावचं वुत्तं संगहसारक्खणोवेदं ॥ ३९२ ॥
अध्वस्तेनश्वापदराजनदीरोधनाशिवे ओमे । वैयावृत्त्यं उक्तं संग्रहसारक्षणोपेतम् ॥ ३९२ ॥
अर्थ-जो साधु मार्गमें खेदयुक्त हो, चोर नाहर वघेरा नदीरोध मरीरोगादिक उपद्रवों सहित हो तथा दुर्भिक्षसे पीडित हो उसका वैयावृत्त्य करना कहा गया है । वह ऐसे करना-आये हुएका संग्रह करना ( रखना) संग्रहकी रक्षा करना चाहिये ३९२ ___ आगे खाध्यायतपका खरूप कहते हैं;परियणाय वायण पडिच्छणाणुपेहणा य धम्मकहा। थुदिमंगलसंजुत्तो पंचविहो होइ सज्झाओ ॥ ३९३ ॥
परिवर्तनं वाचनं पृच्छना अनुप्रेक्षा च धर्मकथा । स्तुतिमंगलसंयुक्तः पंचविधो भवति स्वाध्यायः ॥ ३९३ ॥