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________________ पंचाचाराधिकार ५। १५५ केती मेत्ती माणस्स भंजणं गुरुजणे य बहुमाणं । तित्थयराणं आणा गुणाणुमोदो य विणयगुणा ३८८ कीर्तिः मैत्री मानस्य भंजनं गुरुजने च बहुमानं । तीर्थकराणां आज्ञा गुणानुमोदश्च विनयगुणाः ॥३८८ ॥ अर्थ-सब जगह प्रसिद्धि, सबसे मित्रता, गर्वका त्याग, आचार्यादिकोंसे बहुमानका पाना, तीर्थंकरोंकी आज्ञाका पालन, गुणोंसे प्रेम करना इतने गुण विनय करने वालेके प्रगट होते हैं । आगे वैयावृत्त्यतपका स्वरूप कहते हैं;आइरियादिसु पंचसु सबालवुढाउलेसु गच्छेमु । वेजावच्चं वुत्तं काव्वं सव्वसत्तीए ॥ ३८९ ॥ आचार्यादिषु पंचसु सबालवृद्धाकुलेषु गच्छेषु । वैयावृत्त्यं उक्तं कर्तव्यं सर्वशक्त्या ॥ ३८९ ॥ अर्थ-आचार्य उपाध्याय स्थविर प्रवर्तक गणधर इन पांचोंमें नवीनदीक्षित तथा गुण अवस्था आदिसे बड़े ऐसे मुनियोंके समूहमें अपनी शक्तिके अनुसार औषधि आदिसे उपकार सेवा करनी चाहिये ॥ ३८९ ॥ गुणधीए उवज्झाए तवस्सि सिस्से य दुव्बले । साहुगणे कुले संघे समणुण्णे य चापदि ॥ ३९० ॥ गुणाधिके उपाध्याये तपखिनि शिष्ये च दुर्बले । साधुगणे कुले संघे समनोज्ञे च चापदि ॥३९०॥ अर्थ-गुणोंसे अधिकमें, श्रुतगुरुओंमें, कायक्लेशतपकरने. वालोंमें, शिष्योंमें, रोगसे पीडितोंमें, ऋषि यति मुनि अनगाररूप
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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