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________________ १५४ मूलाचार अब विनयका फल दिखलाते हैं: विryण विप्पहीणस्स हवदि सिक्खा णिरत्थिया सव्वा । विणओ सिक्खाए फलं विणयफलं सव्वकल्लाणं ३८५ विनयेन विप्रहीनस्य भवति शिक्षा निरर्थिका सर्वा । विनयः शिक्षायाः फलं विनयफलं सर्वकल्याणं ॥ ३८५ ॥ अर्थ – जो विनयकर हीन है उसका शास्त्र पढना सब निष्फल है । क्योंकि विद्या पढने का फल विनय है और विन - यका फल स्वर्गमोक्षका मिलना है || ३८५ ॥ विणओ मोक्खद्दारं विणयादो संजमो तवो णाणं । विणणाराहिनदि आइरिओ सव्वसंघो य ॥ ३८६ ॥ विनयः मोक्षद्वारं विनयात् संयमस्तपो ज्ञानं । विनयेनाराध्यते आचार्यश्च सर्वसंघश्च ।। ३८६ ॥ अर्थ - विनय मोक्षका द्वार ( प्रवेशमार्ग ) है, विनयसे ही संयम तप और ज्ञान होता है, और विनयसे ही आचार्य और सब संघकी सेवा होसकती है ॥ ३८६ ॥ आयारजीदकप्पगुणदीवणां अत्तसोधि णिज्जंजा । अज्जवमद्दवलाहवभत्तीपल्लादकरणं च ॥ ३८७ ॥ आचारजीदक गुणदीपनां आत्मशुद्धिः निर्द्वद्वः । आर्जवमार्दवलाघवभक्तिप्रह्लादकरणानि च ।। ३८७ ॥ अर्थ — आचारके, जीदप्रायश्चित्तके, कल्पप्रायश्चित्तके गुणका प्रगट होना; आत्माको कर्मोंसे छूटनेरूप शुद्धि, कलहादि रहित होना, आर्जव, मार्दव, लोभका त्याग, गुरुओंकी सेवा, सबको सुखी करना - ये सब विनयके गुण हैं || ३८७ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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