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________________ पंचाचाराधिकार ५ । अभ्युत्थानं सन्नतिः आसनदानं अनुप्रदानं च | कृतिकर्म प्रतिरूपं आसनत्यागश्च अनुवजनं ॥ ३८२ ॥ अर्थ - आदरसे उठना, मस्तक नमाके नमस्कार, आसन देना, पुस्तकादि देना, यथायोग्य श्रुतभक्ति आदि पूर्वक कायोत्सर्गकरना अथवा शीत आदि बाधाका मेंटना, गुरुओंके आगे ऊंचा आसन छोड़के बैठना, जाते हुएके कुछ दूरतक साथ जाना । ये सात कायिकविनय के भेद हैं || ३८२ ॥ हिदमिदपरिमिदमासा अणुवीचीभासणं च बोधव्वं । अकुसलमणस्स रोधो कुसलमणपवत्तओ चेव ॥ ३८३ हितमितपरिमितभाषा अनुवीचिभाषणं च बोद्धव्यं । अकुशलमनसो रोधः कुशलमनः प्रवर्तकश्चैव ॥ ३८३ ॥ अर्थ - हितरूप ( धर्मसहित ) वचन बोलना, अल्प अक्षर अर्थगंभीरतावाले वचन बोलना, कारण सहित वचन बोलना, शास्त्र के अनुसार वचन बोलना - ये चार भेद वचनविनयके हैं । और जो पापको ग्रहण करानेवाले चित्तको रोकना, धर्ममें उद्यमी हुए मनको प्रवर्ताना- ये दो भेद मानसिक विनयके हैं ॥ ३८३ ॥ रादिणिए ऊणरादिणिएसु अ अजासु चेव गिहिवग्गे । विणओ जहारिओ सो कायव्वो अप्पमत्तेण ॥ ३८४ ॥ रात्र्यधिके ऊनरात्र्यधिकेषु च आर्यासु चैव गृहिवर्गे । विनयः यथार्हः स कर्तव्यः अप्रमत्तेन ॥ ३८४ ॥ अर्थ- दीक्षागुरु श्रुतगुरु तपोधिक तथा इनसे तपकर घटते गुणोंकर घटते अवस्थाकर घटते साधुओंमें, आर्यिकाओंमें, श्रावकलोकोंमें यथा योग्य विनय अप्रमादी साधुको करना चाहिये ३८४ १५३
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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