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________________ १५० मूलाचारप्रत्युद्गमनमायातस्य प्रस्थितस्यानुसाधनं चैव ॥ ३७३ ॥ अर्थ—साधुओंको आते हुए देखे पहले तो आसनसे उठ खड़े होजाना, सिद्धभक्ति आदि करके कायोत्सर्ग करना, हाथजोड़कर नमस्कार करना, आते हुए ऋषीश्वरों के सामने जाना, जानेबालोंको पहुंचानेके लिये साथ जाना-इस तरह कायसे आदर करना ॥ ३७३ ॥ णीचं ठाणं णीचं गमणं णीचं च आसणं सयणं । आसणदाणं उवगरणदाणं ओग्गासदाणं च ॥३७४॥ नीचं स्थानं नीचं गमनं नीचं च आसनं शयनं । आसनदानं उपकरणदानं अवकाशदानं च ॥ ३७४ ॥ अर्थ-गुरु आदिके पीछे खड़े रहना, पीछे गमन करना, नीचे बैठना, नीचे सोना, गुरुओंको आसन देना, पुस्तक आदि धर्मोपकरण देना, प्रासुक वसतिका वतादेना-इत्यादि कायविनय है ॥ ३७४ ॥ पडिरूवकायसंफासणदा पडिरूपकालकिरिया य । पोसणकरणं संथरकरणं उवकरणपडिलिहणं ॥ ३७५॥ प्रतिरूपकायसंस्पर्शनता प्रतिरूपकालक्रिया च । प्रेष्यकरणं संस्तरकरणं उपकरणं प्रतिलेखनं ॥ ३७५ ॥ अर्थ-बलके अनुसार शरीरका स्पर्शन मर्दन, कालके अनुसार क्रिया करना अर्थात् उष्णकालमें शीतक्रिया शीतकालमें उष्णक्रिया, आज्ञाके अनुसार करना, संथारा करदेना, पुस्तकादिका सोधदेना ॥ ३७५॥ इच्चेवमादिओ जो उवयारो कीरदे सरीरेण । ..
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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