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________________ पंचाचाराधिकार ५। १४३ तपकी क्रियामें सावधान रहनेवाले भव्यजीवको इन चारोंका मरणपर्यंत सबसे पहले त्याग करदेना चाहिये ॥ ३५४ ॥ ___ आगे वृत्तिपरिसंख्यानतपको कहते हैंगोयरपमाण दायगभायणणाणविधाण जं गहणं । तह एसणस्स गहणं विविधस्स वुत्तिपरिसंखा॥३५॥ गोचरप्रमाणं दायकभाजननानाविधानं यगृहणं ।। तथा अशनस्य ग्रहणं विविधस्य वृत्तिपरिसंख्या ॥३५५ ॥ अर्थ-गृहोंका प्रमाण, भोजनदाताका विशेष, कांसे आदिपात्रका विशेष, और मौंठ सत्तू आदि भोजनका विशेष-इनमें अनेकतरहके विकल्प कर भोजन ग्रहण करना वह वृत्तिपरिसंख्यातप है। जैसे आज हम कांसेके पात्रमें अथवा सत्तू ही मिलेगा तभी आहार लेंगे नहीं तो न लेंगे इत्यादि कठिन प्रतिज्ञायें अंतरायकर्मकी परीक्षार्थ साधुजन करते हैं ॥ ३५५ ॥ आगे कायक्लेशतपको कहते हैं;ठाणसयणासणेहिं य विविहेहिं य उग्गयेहिं बहुगेहिं। अणुवीचीपरिताओ कायकिलेसो हवदि एसो॥३५६॥ स्थानशयनासनैश्च विविधैश्वावग्रहैः बहुभिः। अनुवीचिपरितापः कायक्लेशः भवति एषः ॥ ३५६ ॥ अर्थ-खड़ा रहना, एकपार्श्व मृतककी तरह सोना, वीरासनादिसे बैठना इत्यादि अनेक तरहके कारणोंसे शास्त्रके अनुसार आतापन आदि योगोंकर शरीरक्लेश देना वह कायक्लेशतप है ॥ ३५६ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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