SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 179
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १४२ मूलाचार मूलादि योगों में तथा स्वाध्याय आदिमें यह अवमौदर्य तपकी वृत्ति उपकार करती है और इंद्रियोंको स्वेच्छाचारी नहीं होने देती ३५१ आगे रसपरित्याग तपका स्वरूप कहते हैं;खीरद हिसप्पितेलगुडलवणाणं च जं परिच्चयणं । तित्तकडुकसायंबिलमधुररसाणं च जं चयणं ॥ ३५२ ॥ क्षीरदधिसर्पिस्तैलगुडलवणानां च यत् परित्यजनं । तिक्तकटुकषायाम्लमधुररसानां च यत् त्यजनं ॥ ३५२ ॥ अर्थ — दूध दही घी तेल गुड लवण ( नोंन ) इन छह रसोंका त्याग अथवा चर्परा कडुआ कसैला खट्टा मीठा इनमें से त्याग वह रसपरित्याग तप है ॥ ३५२ ॥ - आगे चार महाविकृतियों को कहते हैं ;चत्तारि महावियडी य होंति णवणीदमज्जमं समधू । कंखापसंगप्पासंजमकारीओ एदाओ ॥ ३५३ ॥ चतस्रो महाविकृतयश्च भवंति नवनीतमद्यमांसमधूनि । कांक्षाप्रसंगदर्पासंयमकारिण एताः || ३५३ ॥ अर्थ —लोंनीघी, मदिरा, मांस, शहत ये चार महाविकृतियां हैं वे काम मद ( अभिमान व नशा ) और हिंसाको करत हैं ॥ ३५३ ॥ आणाभिकंखिणावज्जभीरुणा तवसमाधिकामेण । ताओ जावज्जीवं णिवुडाओ पुरा चेव ॥ ३५४ ॥ आज्ञाभिकांक्षिणा अद्यभीरुणा तपः समाधिकामेन । ताः यावज्जीवं निर्व्यूढा पुरा चैव ॥ ३५४ ॥ अर्थ- सर्वज्ञकी आज्ञाको माननेवाले पापोंसे डरनेवाले और
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy