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मूलाचारकायशोषण, और छठा-विविक्तशयनासन-इसतरह बाह्यतपके छह भेद हैं ॥ ३४६ ॥ इतिरियं जावजीवं दुविहं पुण अणसणं मुणेदव्वं । इतिरियं साकंखं णिरावकंखं हवे बिदियं ॥ ३४७ ॥ इतिरियं यावजीवं द्विविधं पुनः अनशनं ज्ञातव्यं । इतिरियं साकांक्षं निराकांक्षं भवेत् द्वितीयं ॥ ३४७॥
अर्थ-अनशनतपके दो भेद हैं-इतिरिय, यावज्जीव । कालकी मर्यादासे इतिरिय होता है और दूसरा आकांक्षारहित होता है ॥ ३४७ ॥ छट्ठमदसमदुवादसेहिं मासद्धमासखमणाणि । कणगेगावलिआदी तवोविहाणाणि णाहारे ॥ ३४८॥
षष्ठाष्टमदशमद्वादशैः मासार्धमासक्षमणानि । कनकैकावल्यादीनि तपोविधानानि अनाहारे ॥ ३४८ ॥
अर्थ-एकदिनमें दो भोजनवेला कहीं हैं। चार भोजनवेलाका त्याग उसे चतुर्थ अथवा उपवास कहते हैं, छह भोजनवेलाका त्याग वह दो उपवास कहे जाते हैं इसी को षष्ठतप कहते हैं । षष्ठ अष्टम दशम द्वादश, पंद्रह, एकमास त्याग, कनकावली एकावली मुरज मद्यविमानपंक्ति सिंहनिःक्रीडित इत्यादि तपोंके भेद जहां हैं वह सब साकांक्ष अनशनतप है ॥ ३४८ ॥
अब निराकांक्ष अनशनतपको कहते हैं;भत्तपइण्णा इंगिणि पाउवगमणाणि जाणि मरणाणि । अण्णेवि एवमादी बोधव्वा णिरवकंखाणि ॥३४९॥
भक्तप्रतिज्ञा इंगिनी प्रायोपगमनानि यानि मरणाणि ।