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पंचाचाराधिकार ५। अर्थ-इसलिये प्रमादरहित हुआ तू इन भावनाओंसे आत्माका चितवन कर क्योंकि इनके भावनेसे निश्चयकर निर्दोष संपूर्ण व्रत तेरे होंगे ॥ ३४३ ॥
अब तपाचार कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं;एसो चरणाचारो पंचविधो वण्णिदो समासेण । एत्तो य तवाचारं समासदो वण्णयिस्सामि ॥ ३४४ ॥
एष चरणाचारः पंचविधो वर्णितः समासेन । इतश् तप आचारं समासतो वर्णयिष्यामि ॥ ३४४ ॥
अर्थ-इसतरह ये पांच प्रकारका चारित्राचार संक्षेपसे कहा यहांसे आगे तपाचारको संक्षेपसे कहता हूं ॥ ३४४ ॥ दुविहो य तवाचारो बाहिर अब्भंतरो मुणेयव्यो । एकेको विय छद्धा जधाकमं तं परवेमो ॥ ३४५॥ द्विविधश्च तप आचारः बाह्य आभ्यंतरो ज्ञातव्यः । एकैकोपि च षोढा यथाक्रमं तं प्ररूपयामि ॥ ३४५ ॥
अर्थ-तपाचारके दो भेद हैं-बाह्य, आभ्यंतर । उनमेंसे भी एक एकके छह छह भेद जानना । उनको मैं क्रमसे कहता हूं ॥ ३४५॥ ___ आगे बाह्यतपका वर्णन करते हैं;अणसण अवमोदरियं रसपरिचाओ य वुत्तिपरिसंखा। कायस्स च परितावो विवित्तसयणासणं छटुं॥३४६॥
अनशनं अवमौदर्य रसपरित्यागश्च वृत्तिपरिसंख्या।
कायस्य च परितापो विविक्तशयनासनं षष्ठं ॥ ३४६ ॥ . अर्थ-अनशन, अवमोदर्य, रसपरित्याग, वृत्तिकी परिसंख्या,