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मूलाचार
स्थाके भोगोंको याद करना, द्रव्यसहित अथवा रागसहित वसतिका होना, संयमके विरुद्ध दुष्ट रागकथा करना, इष्टरूप पुष्टि करनेवाला मद करनेवाला आहार - इन पांचोंसे विरक्त होना त्याग करना वे पांच ब्रह्मचर्य महात्रतकी भावनायें हैं ॥ ३४० ॥ अपरिग्गहस्स मुणिणो सहप्फरिसरसरूवगंधेसु । रागद्दोसादीणं परिहारो भावणा पंच ।। ३४१ ॥
अपरिग्रहस्य मुनेः शब्दस्पर्शरसरूपगंधेषु । रागद्वेषादीनां परिहारः भावनाः पंच ।। ३४१ ॥
अर्थ — परिग्रहरहित मुनिके शब्द स्पर्श रस रूप गंध इन पांच विषयोंमें राग द्वेष न होना - ये पांच, भावना परिग्रहत्यागमहाव्रतकी हैं ॥ ३४१ ॥
ण करेदि भावणाभाविदो हु पीलं वदाण सव्वेसिं । साधू पासुत्तो स मणागवि किं दाणि वेदंतो ॥ ३४२ ॥ न करोति भावनाभावितो हि पीडां व्रतानां सर्वेषां । साधुः प्रसुप्तः स मनागपि किमिदानीं वेदयन् ॥ ३४२ ॥ अर्थ - पच्चीस भावनाओंको भावता मुनि सोता हुआ भी सब व्रतों की विराधना नहीं करता तो जाग्रत अवस्थाकी क्या वात है । खप्नमें भी उन भावनाओं को ही देखता है व्रतों की विराधना नहीं देखता ॥ ३४२ ॥
एदाहि भावणाहिं दु तम्हा भावेहि अप्पमत्तो तुं । अच्छिद्दाणि अखंडाणि ते भविस्संति हु वदाणि ॥ ३४३ ॥
एताभिः भावनाभिस्तु तस्मात् भावय अप्रमत्तस्त्वं । अच्छिद्राणि अखंडानि ते भविष्यंति खलु व्रतानि ॥ ३४३ ॥