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________________ पंचाचाराधिकार ५। १३७ गुप्ति और देखकर अन्न पान लेनारूप आलोक्यपानभोजन-ये पांच अहिंसाव्रतकी पूर्णताकी भावनायें हैं ॥ ३३७ ॥ कोहभयलोहहासपइण्णा अणुवीचिभासणं चेव । बिदियस्स भावणाओ वदस्स पंचेव ता होंति॥३३८॥ क्रोधभयलोभहास्यप्रतिज्ञाः अनुवीचिभाषणं चैव । द्वितीयस्य भावनाः व्रतस्य पंचैव ता भवंति ॥ ३३८ ॥ अर्थ-क्रोध भय लोभ हास्य इनका त्याग और सूत्रानुसार बोलना-ये पांच सत्यव्रतकी भावनायें हैं ॥ ३३८ ॥ जायणसमणुण्णमणा अणण्णभावोवि चत्तपडिसेवी। साधम्मिओवकरणस्सणुवीचीसेवणं चावि ॥ ३३९ ॥ याजा समनुज्ञापना अनन्यभावोपि त्यक्तप्रतिसेवी । साधर्मिकोपकरणस्यानुवीचिसेवनं चापि ॥ ३३९ ॥ अर्थ-आचार्यादिसे प्रार्थनाकर पुस्तकादि लेना, जिसके उपकरण हैं उसको जताकर लेना, दुष्टभाव अर्थात् परकी वस्तुमें आत्मबुद्धि न करना, निर्दोष धर्मोपकरण ग्रहण करना अथवा वियत ( आचार्य ) की सेवा करना, समानधर्मवालोंके पुस्तक पीछी आदि उपकरणोंको आगमके अनुसार सेवना-ऐसे ये अचौर्यमहाव्रतकी पांच भावनायें हैं ॥ ३३९ ॥ महिलालोयण पुव्वरदिसणं संसत्तवसधिविकहाहिं । पणिदरसेहिं य विरदी य भावणा पंच बह्ममि ॥३४०॥ महिलालोकनं पूर्वरतिस्सरणं संसक्तवसतिविकथाभ्यः । प्रणीतरसेभ्यश्च विरतिश्च भावनाः पंच ब्रह्मणि ॥ ३४० ॥ अर्थ-दुष्ट परिणामोंसे स्त्रियोंको देखना, पहले ग्रहस्थ अव
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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