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________________ १३२ मूलाचार. अर्थ-विष्ठा, मूत्र, कफ, नाकका मैल, आदि द्रव्यको हरे तृण आदिसे रहित प्रासुकभूमिमें अच्छीतरह देखकर निक्षेपण करे ॥ ३२२ ॥ रादो दु पमज्जित्ता पण्णसमणपेक्खिदम्मि ओगासे । आसंकविसुद्धीए अपहत्थगफासणं कुज्जा ॥ ३२३ ॥ रात्रौ तु प्रमार्जयित्वा प्रज्ञाश्रमणप्रेक्षिते अवकाशे। आशंकाविशुद्धये अपहस्तकस्पर्शनं कुर्यात् ॥ ३२३॥ अर्थ-रात्रिमें संघको पालनेवाले आचार्यसे देखे हुए स्थानको आप भी देख भालकर मल मूत्रादि क्षेपण करे । जो वहां सूक्ष्मजीवकी आशंका हो तो उस आशङ्काकी शुद्धिकेलिये कोमलपीछीको लेकर हथेलीसे उस जगहको देखे ॥ ३२३ ॥ जदि तं हवे असुद्धं बिदियं तदियं अणुण्णवे साहू । लघुए अणिछायारे ण देज साधम्मिए गुरूयो ॥३२४॥ यदि तत् भवेत् अशुद्धं द्वितीयं तृतीयं अनुमन्येत साधुः । लघु अनिच्छाकारे न देयं सधमिणि गुरु अयः ॥३२४॥ अर्थ-जो पहला स्थान अशुद्ध हो तो दूसरा यदि वह भी अशुद्ध हो तो वह साधु तीसरा स्थान देखे । कोई समय रोगसे पीडित होके अथवा शीघ्रतासे अशुद्ध प्रदेशमें मल छूट जाय तो उस धर्मात्मा साधुको बड़ा प्रायश्चित्त न दे ॥ ३२४ ॥ पदिठवणासमिदीवि य तेणेव कमेण वण्णिदा होदि। वोसरणिजं दव्वं कुथंडिले वोसरत्तस्स ॥ ३२५ ॥ प्रतिष्ठापनासमितिरपि च तेनैव क्रमेण वर्णिता भवति । व्युत्सर्जनीयं द्रव्यं कुस्थंडिले व्युत्सृजतः ॥ ३२५ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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