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________________ पंचाचाराधिकार ५ । १३१ करता है वह संयमकी प्राप्तिसे साधु कहलाता है । यही आदाननिक्षेपण समिति है ॥ ३१९ ॥ सहसाणा भोइददुप्पमज्जिदअपच्चुवेक्खणा दोसा । परिहरमाणस्स हवे समिदी आदाणणिक्खेवा ॥ ३२० ॥ सहसानाभोगितदुष्प्रमार्जिताप्रत्युपेक्षणान् दोषान् । परिहरतः भवेत् समितिः आदाननिक्षेपा ।। ३२० ॥ अर्थ – शीघ्रतासे, विनादेखे, अनादरसे, बहुत कालसे उपकरणोंका उठाना रखना स्वरूप दोषोंका जो त्याग करता है उसके आदाननिक्षेपण समिति होती है । भावार्थ – स्वस्थवृत्तिसे द्रव्य व द्रव्यस्थानको नेत्रोंसे देख कोमलपीछीसे पुस्तकादिको उठान रखना वही आदाननिक्षेपण समिति है ॥ ३२० ॥ वणदाह किसिमसिकदे थंडिलेणुपरोधे वित्थिण्णे । अवगदजंतु विवित्ते उच्चारादी विसज्जेज्जो ॥ ३२१ ॥ वनदाहकृषिमपिकृते स्थंडिलेनुपरोधे विस्तीर्णे | अपगतजंतौं विविक्ते उच्चारादीन् विसर्जयेत् ।। ३२१ ॥ अर्थ – दावानिसे जला हुआ प्रदेश, हलकर जुता हुअ स्थान, मसानभूमिका प्रदेश, खारसहित भूमि, लोग जहां रोकें नहीं ऐसी जगह, विशालस्थान, त्रस जीवरहित स्थान, जन रहित - ऐसी जगह में मल मूत्रादिका त्याग करे ॥ ३२९ ॥ उच्चारं परसवणं खेलं सिंघाणयादियं दव्वं । अचित्तभूमिदे से पडिलेहित्ता विसज्जेज्जो ॥ ३२२ ॥ उच्चारं प्रश्रवणं खेलं सिंघाणकादिकं द्रव्यं । अचित्तभूमिदेशे प्रतिलेख्य विसर्जयेत् ॥ ३२२ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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