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________________ १३० मूलाचार सावज्जजोग्गवयणं वज्जंतोऽवज्जभीरु गुणकंखी । सावज्जवज्जवयणं णिचं भासेज्ज भासतो ॥ ३१७ ॥ सावद्यायोग्यवचनं वर्जयन् अवद्य भीरुः गुणकांक्षी । सावद्यवर्ज्यवचनं नित्यं भाषयेत् भाषयन् ॥ ३१७ ॥ अर्थ — जो पापोंसे डरता है गुणों को चाहता है पापसहित अयोग्य वचनोंको छोडना चाहता है वह पापरहित वचनोंको हमेशा बोलै यह भी सत्यवचन है ॥ ३१७ ॥ आगे एषणा समितिको कहते हैं; उग्गमउप्पादणएसणेहिं पिंडं च उवधि सज्जं च । सोतस् य मुणिणो परिसुज्झइ एसणासमिदी ३१८ उद्गमोत्पादनैषणैः पिंडं च उपधिं शय्यां च । शोधयतश्च मुनेः परिशुद्ध्यति एषणासमितिः ॥ ३९८ ॥ अर्थ – उद्गम उत्पादन अशन दोषोंसे आहार, पुस्तकादि उपधि, वसतिकाको शोधनेवाले मुनिके शुद्ध एषणा समिति होती है । इन दोषोंका स्वरूप आगे कहा जायगा ॥ ३१८ ॥ आगे आदाननिक्षेपण समितिको कहते हैं; - आदाणे णिक्खेवे पडिलेहिय चक्खुणा पमज्जेज्जो । दव्वं च दव्वठाणं संजमलद्धीए सो भिक्खू ।। ३१९ ॥ आदाने निक्षेपे प्रतिलेख्य चक्षुषा प्रमार्जयेत् । द्रव्यं च द्रव्यस्थानं संयमलब्ध्या स भिक्षुः || ३१९ ॥ अर्थ-ग्रहण और रखनेमें पीछी कमंडलु आदि वस्तुको तथा वस्तुके स्थानको चक्षुसे अच्छीतरह देखकर पीछी से जो शोधन
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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