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________________ पंचाचाराधिकार ५। ११७ सामायिक आदि छह आवश्यकको कहनेवाला, महापुरुषोंके चरित्रको वर्णनकरनेवाला ग्रंथ-इसतरहके ग्रंथोंको काल शुद्धि आदि न होनेपरभी पढना चाहिये ॥ २७९ ॥ उद्देस समुद्देसे अणुणापणए अ होति पंचेव । अंगसुदखंधझेणुवदेसा विय पदविभागीय २८० उद्देशे समुद्देशे अनुज्ञार्पणायां च भवंति पंचैव । अंगश्रुतस्कंधप्राभृतप्रदेशा अपि पदविभागी च ॥ २८०॥ अर्थ-बारह अंग चौदहपूर्व वस्तु प्राभृत प्राभृतप्राभृत इनके पादविभागसे प्रारंभमें वा समाप्तिमें वा गुरुओंकी अवज्ञा होनेपर पांच पांच उपवास अथवा प्रायश्चित्त अथवा कायोत्सर्ग कहे गये हैं ॥ २८० ॥ अब विनयशुद्धिको कहते हैं;पलियंकणिसेजगदो पडिलेहियअंजलीकदपणामो। मुत्तत्थजोगजुत्तो पढिदव्वो आदसत्तीए ॥२८१॥ पर्यकनिषद्यागतः प्रतिलेख्य अंजलिकृतप्रणामः। सूत्रार्थयोगयुक्तः पठितव्यः आत्मशक्त्या ॥ २८१॥ अर्थ-पल्यंक आसन अथवा वीरासनादिकर बैठा हुआ, पुस्तकको देखकर पीछीसे भूमिको सोधकर हाथकी अंजुलीसे प्रणाम करनेवाला, अंगादि ग्रंथोंको अर्थका विरोध मेंटकर अपनी शक्तिके अनुसार पढे ॥ २८१ ॥ आगे उपधान शुद्धिको कहते हैंआयंविल णिवियडी अण्णं वा होदि जस्स कादव्वं । तं तस्स करेमाणो उपहाणजुदो हवदि एसो ॥ २८२॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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