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________________ १९८ . मूलाचारआचाम्लं निर्विकृतिः अन्यत् वा भवति यस्य कर्तव्यं । तत् तस्य कुर्वाणः उपधानयुतो भवति एषः ॥ २८२ ॥ अर्थ-कांजीका आहार (आचाम्ल ) अथवा नीरस निर्विकार अन्नादिका आहार (निर्विकृतितप) तथा और भी जिस शास्त्रके योग्य जो क्रिया कही हो उसका नियम करना वह उपधान है इससे भी शास्त्रका आदर होता है ॥ २८२ ॥ आगे बहुमानका स्वरूप कहते हैं;सुत्तत्थं जप्पंतो वायंतो चावि णिजराहेदुं । आसादणं ण कुजा तेण किदं होदि बहुमाणं ॥२८३॥ सूत्रार्थ जल्पयन् वाचयंश्चापि निर्जराहेतोः । आसादनां न कुर्यात् तेन कृतं भवति बहुमानं ॥ २८३ ॥ अर्थ-अंगपूर्वादिका सम्यक् अर्थ उच्चारण करता वा पढता पढाता हुआ जो भव्य कर्मनिर्जराके लिये अन्य आचार्योंका वा शास्त्रोंका अपमान (अनादर ) नहीं करता है वही बहुमान गुणको पालता है ॥ २८३ ॥ आगे निह्नवका स्वरूप कहते हैंकुलवयसीलविहणे मुत्तत्थं सम्मगागमित्ताणं । कुलवयसीलमहल्ले णिण्हवदोसो दु जप्पंतो ॥२८४ ॥ कुलव्रतशीलविहीनाः सूत्रार्थ सम्यगवगम्य । कुलवतशीलमहतो निह्नवदोषस्तु जल्पंतः ॥ २८४ ॥ अर्थ-गुरूका संतान, अहिंसादिव्रत, और व्रतकी रक्षारूप शील-इनकर रहित (मलिन) मठादिकका सेवनकर कुलव्रत शीलसे महान् गुरुके पास अच्छीतरह पढकर कहे कि मैंने जैन
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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