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पंचाचाराधिकार ५।
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द्रव्यविचिकित्सा है और भूख प्यास आदि सहन करना ठीक नहीं है ऐसा विकल्प करना वह भावविचिकित्सा जानना ।।२५२॥ उच्चारं पस्सवणं खेलं सिंघाणयं च चम्मट्टी। पूयं च मंससोणिदवंतं जल्लादि साधूणं ॥ २५३ ॥
उच्चारं प्रस्रवणं श्लेष्मा सिंघानकं च चर्मास्थि । पूतिं च मांसशोणितवांतं जल्लादि साधूनाम् ॥ २५३ ॥
अर्थ—साधुओंके शरीरके विष्ठामल, मूत, कफ, नाकका मल, चाम, हाड, राधि, मांस, लोही, वमन, सब अंगका मल, लारइत्यादि मलोंको देखकर ग्लानि करना वह द्रव्यविचिकित्सा है ॥ छुहतण्हा सीउण्हा दंसमसयमचेलभावो य। अरदिरदी इत्थिचरिया णिसिद्धिया सेन्ज अकोसो२५४ बधजायणं अलाहो रोग तणप्फास जल्ल सकारो। तह चेव पण्णपरिसह अण्णाणमदंसणं खमणं ॥२५५ क्षुत्तृष्णा शीतोष्णं दंशमशकमचेलभावश्च । अरतिरती स्त्रीचयों निषद्या शय्या आक्रोशः ॥ २५४ ॥ बधयाचनं अलाभो रोगस्तृणस्पर्शः जल्लं सत्कारः । तथा चैव प्रज्ञापरीषहः अज्ञानमदर्शनं क्षमणं ॥ २५५ ॥
अर्थ-भूख प्यास शीत उष्ण दंशमशक नग्नपरीषह अरतिरति स्त्रीपरीषह चर्या निषधा शय्या आक्रोश वध याचना अलाभ रोग तृणस्पर्श मल सत्कार प्रज्ञापरीषह अज्ञान अदर्शनपरीषह-इन बाईस परीषहोंसे संक्लेश परिणाम करना वह भावविचिकित्सा है ॥ २५४ । २५५॥ लोइंयवेदिय सामाइएसु तह अण्णदेवमूढत्वं ।