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मूलाचारणचा दंसणघादी ण य कायव्वं ससत्तीए ॥ २५६ ॥
लौकिकवैदिकसामायिकेषु तथा अन्यदेवमूढत्वं । ज्ञात्वा दर्शनघाती न च कर्तव्यं स्वशक्त्या ॥ २५६ ॥
अर्थ-मूढताके चार भेद हैं-लौकिकमूढता वैदिकमूढता सामायिकमूढता अन्यदेवमूढता । इन चारोंको दर्शनघातक जानकर अपनी शक्तिकर नहीं करना चाहिये ॥ २५६ ॥ कोडिल्लमासुरक्खा भारहरामायणादि जे धम्मा। होजु व तेसु विसोती लोइयमूढो हव दि एसो २५७
कौटिल्यमासुरक्षः भारतरामायणादयो ये धर्माः। भवेत् वा तेषु विश्रुतिः लौकिकमूढः भवति एषः ॥२५७।। अर्थ-कुटिलता प्रयोजनवाले चार्वाक व चाणिक्यनीति आदिके उपदेश, यज्ञहिंसामें धर्म माननेवाले वैदिकधर्मके शास्त्र, महान पुरुषोंको असत्य दोष लगानेवाले महाभारत रामायणआदि शास्त्र-इनमें धर्म समझना वह लौकिकमूढता है ॥ २५७ ।।
आगे वैदिकमूढताको कहते हैं;ऋगवेदसामवेदा वागणुवादादिवेदसत्थाई। तुच्छाणित्ति ण गेण्हइ वेदियमूढो हवदि एसो॥२५८ ऋग्वेदसामवेदौ वागनुवादादि वेदशास्त्राणि । तुच्छानि इति न गृह्णाति वैदिकमूढो भवति एषः ॥२५८॥ अर्थ-ऋग्वेद सामवेद प्रायश्चित्तादि वाक्, मनुस्मृति आदि अनुवाक् आदिशब्दसे यजुर्वेद अथर्ववेद-ये सब हिंसाके उपदेशक हैं अमिहोम आदि कार्योंके कहनेवाले हैं इसलिये धर्मरहित निर