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मूलाचार
धर्मकी ) अभिलाषा । जो इन तीनों अभिलाषाओंको नहीं करता वही सम्यग्दर्शनकी शुद्धिको पाता है ॥ २४९ ॥ बलदेवचक्कवट्टीसेट्ठीरायत्तणादि अहिलासो । इह परलोगे देवत्तपत्थणा दंसणाभिघादी सो ॥ २५० ॥ बलदेवचक्रवर्तिश्रेष्ठिराज्यत्वाद्यभिलाषः ।
इह परलोके देवत्वप्रार्थना दर्शनाभिघाती सः ॥ २५० ॥ अर्थ — इस लोकमें बलभद्र चक्रवर्ती होना राजसेठ होना इत्यादिक संपत्तिकी इच्छा और परलोकमें इंद्र होनेकी देव होने की अभिलाषा करना वह दर्शनको घातनेवाला कांक्षा दोष है ॥ २५० ॥ रत्तवडचरगतावसपरिहत्तादीणमण्णतित्थीणं ।
धम्ममि य अहिलासो कुधम्मकंखा हवदि एसा २५१ रक्तपटचरकतापसपरिव्राजादीनामन्यतैर्थिकानां ।
धर्मे च अभिलाषः कुधर्मकांक्षा भवति एषा ।। २५१ ॥ अर्थ — वैभाषिकादि चार भेदवाले बौद्ध, नैयायिक वैशेषिक, जटाधारी वैनयिक, सांख्यमती आदि अन्य धर्मियोंके धर्ममें अभिलाषा करना वह कुधर्मकांक्षा नामा दोष है || २५१ ॥ विदिगच्छा वि यदुविहा दव्वे भावे य होइ णायव्वा । उच्चारादिसु दव्वे खुधादिए भावविदिगिंछा ॥ २५२ ॥
विचिकित्सापि च द्विविधा द्रव्ये भावे च भवति ज्ञातव्या । उच्चारादिषु द्रव्येषु क्षुधादिके भावविचिकित्सा ॥ २५२ ॥
अर्थ — विचिकित्सा ( ग्लानि ) दोप्रकार है - द्रव्य और भाव । मुनिराजके मूत्र विष्ठा लार आदिको देखकर ग्लानि करना वह