SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 140
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १०३ पंचाचाराधिकार ५। मिच्छत्ताविरदीहिं य कसायजोगेहिं जं च आसवदि। दसणविरमणणिग्गहणिरोधणेहिं तु णासवदि॥२४१॥ मिथ्यात्वाविरतिभिश्च कषाययोगैश्च यच आस्रवति । दर्शनविरमणनिग्रहनिरोधनैस्तु नास्रवति ॥ २४१ ॥ अर्थ-मिथ्यात्व अविरति कषाय योगोंसे जो कर्म आते हैं वे कर्म सम्यग्दर्शन विरति क्षमादिभाव और योगनिरोधसे नहीं आने पाते-रुकजाते हैं ॥ २४१ ॥ ___ आगे निर्जराको कहते हैं;-. संजमजोगे जुत्तो जो तवसा चेट्टदे अणेगविधं । सो कम्मणिजराए विउलाए वदे जीवो ॥ २४२॥ संयमयोगेन युक्तः यः तपसा चेष्टते अनेकविधं । स कर्मनिर्जरायां विपुलायां वर्तते जीवः ॥ २४२ ॥ __ अर्थ-इंद्रियादिसंयम और योगकर सहित हुआ जो अनेक ( बारह ) भेद रूप तपमें प्रवर्तता है वह जीव बहुतसे कर्मोंकी निर्जरा करता है ॥ २४२ ॥ आगे दृष्टांतसे जीवकी शुद्धता वतलाते हैं;जह धाऊ धम्मंतो सुज्झदि सो अग्गिणो दु संतत्तो। तवसा तधा विसुज्झदि जीवो कम्मेहिं कणयं वा२४३ यथा धातुः धम्यमानः शुध्यति स अग्निना तु संतप्तः । तपसा तथा विशुध्यति जीवः कर्मभिः कनकं इव।।२४३॥ अर्थ-जैसे मलसहित सोना धातु अग्निसे तपायागया ताड़नादि किया गया शुद्ध होजाता है उसीतरह यह जीव भी तपसे तपाया हुआ कर्मरूपी मैलसे रहित हुआ शुद्ध होजाता है॥२४३॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy