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मूलाचारकर्मोंके आगमनके कारण होते हैं। उनमेंसे अहंतकथित पदार्थों में संशयादि करना मिथ्यात्व है ॥ २३७ ॥ अविरमणं हिंसादी पंचवि दोसा हवंति णादव्वा । कोधादीय कसाया जोगो जीवस्स चिट्ठा दु ॥२३८॥
अविरमणं हिंसादयः पंचापि दोषा भवंति ज्ञातव्याः । क्रोधादयः कषाया योगः जीवस्य चेष्टा तु ॥ २३८ ॥
अर्थ-हिंसा आदि पांच दोषोंको अविरति जानना । क्रोधादि चार कषाय हैं और जीवकी क्रियाको योग कहते हैं ॥ २३८ ॥ ___ आगे संवरको कहते हैंमिच्छत्तासवदारं रंभइ सम्मत्तदढकवाडेण । हिंसादिदुवाराणिवि दढवदफलिहेहि रुब्भंति ॥२३९॥
मिथ्यात्वास्रवद्वारं रुंधति सम्यक्त्वदृढकपाटेन । हिंसादिद्वाराण्यपि दृढव्रतफलकैः रुंधति ॥ २३९ ॥
अर्थ-संवर करनेवाले जीव मिथ्यात्वरूप आस्रवद्वारको सम्यक्त्वरूप दृढ कपाटसे रोकदेते हैं और हिंसादि आस्रवद्वारको दृढ पंचव्रतरूप पट्टेसे रोकते हैं ॥ २३९ ॥ आसवदि जं तु कम्मं कोधादीहिं तु अयदजीवाणं । तप्पडिवक्खेहिं विदु रुंधति तमप्पमत्ता दु ॥ २४० ॥
आस्रवति यत्तु कर्म क्रोधादिभिस्तु अयतजीवानाम् । तत्प्रतिपक्षैः विद्वांसो रुंधति तमप्रमत्तास्तु ॥ २४०॥
अर्थ-यत्नाचार रहित जीवोंके क्रोधआदिकर जो कर्म आते हैं उनको प्रमादरहित ज्ञानी जीव क्रोधादिके प्रतिपक्षी उत्तमक्षमादि धर्मोंसे रोक देते हैं ॥ २४०॥