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________________ पंचाचाराधिकार ५। होदि वणप्फदि वल्ली रुक्खतणादी तहेव एइंदी। ते जाण हरितजीवा जाणित्ता परिहरेदव्वा॥ २१७ ॥ भवति वनस्पतिः वल्ली वृक्षणादीनि तथैव एकेंद्रियाः । तान् जानीहि हरितजीवान् ज्ञात्वा परिहर्तव्याः॥२१७॥ अर्थ-वनस्पति वेल वृक्ष तृण इत्यादिक स्वरूप है । ये एकेंद्रिय हैं। ये सब प्रत्येक साधारण हरितकाय हैं ऐसा जानना और जानकर इनकी हिंसाका त्याग करना चाहिये ॥ २१७ ॥ ___ अब त्रसके भेद कहते हैंदुविधा तसा य उत्ता विगला सगलेंदिया मुणेयव्वा। बितिचउरिंदिय विगला सेसा सगलिंदिया जीवा२१८ द्विविधाः त्रसाश्च उक्ता विकलाः सकलेंद्रिया ज्ञातव्याः । द्वित्रिचतुरिंद्रिया विकलाः शेषाः सकलेंद्रिया जीवाः २१८ अर्थ-त्रसकायिक दो प्रकार कहे हैं विकलेंद्रिय, सकलेंद्रिय । दोइंद्रिय तेइंद्रिय चतुरिंद्रिय इन तीनोंको विकलेंद्रिय जानना और शेष पंचेंद्रिय जीवोंको सकलेन्द्रिय जानना ॥ २१८ ।। संखो गोभी भमरादिआ दु विकलिंदिया मुणेदव्वा । संकलिंदिया य जलथलखचरा सुरणारयणरा य॥२१९ शंखः गोपालिका भ्रमरादिकाः तु विकलेंद्रिया ज्ञातव्याः। सकलेंद्रियाश्च जलस्थलखचराः सुरनारकनराश्च ॥ २१९ ॥ अर्थ-शंख आदि, गोपालिका चींटी आदि, भौंरा आदि, जीव दोइंद्रिय तेइंद्रिय चौइंद्रियरूप विकलेंद्रिय जानना । तथा सिंह आदि स्थलचर, मच्छ आदि जलचर, हंस आदि आकाशचर तिर्यंच और देव नारकी मनुष्य-ये सब पंचेंद्रिय हैं ॥ २१९ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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