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________________ ९९ मूलाचार आस्रव संवर निर्जरा बंध मोक्ष ये नौपदार्थ हैं अर्थात् इनका यथार्थश्रद्धान करना सम्यक्त्व है ॥ २०३ ॥ दुविहाय होंति जीवा संसारत्था य णिव्वुदा चेव । छद्धा संसारत्था सिद्धिगदा णिव्वुदा जीवा ॥ २०४ ॥ द्विविधाः च भवंति जीवाः संसारस्थाः च निर्वृता चैव । षट्धा संसारस्थाः सिद्धिगता निर्वृता जीवाः ॥ २०४ ॥ अर्थ- जीवोंके दो भेद हैं संसारी मुक्त । संसारी जीव छह प्रकार के हैं और जो सिद्धगतिको प्राप्त हैं वे मुक्तजीव हैं ॥२०४॥ अब संसारी जीवोंके छह भेद बतलाते हैं: पुढवी आऊ तेऊ वाऊ य वणष्फदी तहा य तसा । छत्तीसविहा पुढवी तिस्से भेदा इमे णेया ॥ २०५ ॥ पृथिव्यापस्तेजोवायुश्च वनस्पतिस्तथा च त्रसाः । षट्त्रिंशद्विधा पृथिवी तस्या भेदा इमे ज्ञेयाः ॥ २०५ ॥ अर्थ — पृथिवी जल अग्नि वायु वनस्पतिकाय ये पांच स्थावर और द्वींद्रियादि पंचेंद्रियत्तक त्रस इसतरह संसारी जीवोंके छह भेद हैं । उनमेंसे पृथिवीके छत्तीस भेद आगे कहे हुए जानना ॥ २०५ ॥ आगे पृथिवीके छत्तीस भेदों को कहते हैं; पुढवी य बालुगा सक्करा य उवले सिला य लोणे य। अय तंव त य सीसय रुप्प सुवण्णे य वइरे य२०६ हरिदाले हिंगुलए मणोसिला सस्सगंजण पवाले य । अब्भपडलब्भवालु य बादरकाया मणिविधीया २०७ गोमज्झगे य रुजगे अंके फलहे य लोहिदके य ।
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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