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________________ मूलाचारपंचाचाराधिकार ॥५॥ आगे पंचाचारोंको कहते हुए मंगलाचरण करते हैं;तिहुयणमंदिरमहिदे तिलोयबुद्धे तिलोगमत्थत्थे । तेलोकविदिदवीरे तिविहेण य पणमिदे सिद्धे ॥१९८॥ त्रिभुवनमंदिरमहितान् त्रिलोकबुद्धान त्रिलोकमस्तकस्थान् । त्रैलोक्यविदितवीरान् त्रिविधेन च प्रणिपतामि सिद्धान्१९८ अर्थ-तीन लोकके खामी इंद्रादिकर , पूजित, तीनलोकके जाननेवाले, तीनलोकके मस्तक सिद्धक्षेत्रपर विराजमान तीनलोकमें प्रसिद्ध पराक्रमवाले ऐसे सिद्धोंको मैं नमस्कार करता हूं ॥ १९८॥ दसणणाणचरित्ते तव्वे विरियाचरह्मि पंचविहे । वोच्छं अदिचारेऽहं कारिद अणुमोदिदे अकदे॥१९९॥ दर्शनज्ञानचारित्रे तपसि वीर्याचारे पंचविधे। वक्ष्ये अतीचारान् अहं कारितान् अनुमोदितान् च कृतान् ॥ अर्थ-सम्यग्दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तपआचार वीर्याचार-इस तरह पंच आचारोंमें कृत कारित अनुमोदनासे होनेवाले अतीचारोंको ( दोषोंको ) मैं कहता हूं ॥ १९९ ॥ आगे दर्शनाचारके अतीचार कहते हैंदसणचरणविसुद्धी अहविहा जिणवरेहिं णिहिट्ठा। दंसणमलसोहणयं वोछे तं सुणह एगमणा ॥२०॥ दर्शनचरणविशुद्धिः अष्टविधा जिनवरैः निर्दिष्टा । दर्शनमलशोधनकं वक्ष्ये तत् शृणुत एकमनसः ॥ २००॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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