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मूलाचार
सव्वम अहोरते विभासिदव्वो जधाजोग्गं ॥ १८७॥
एष आर्याणामपि च समाचारः यथाख्यातः पूर्वम् । सर्वस्मिन् अहोरात्रे विभाषितव्यो यथायोग्यं ॥ १८७ ॥ अर्थ — जैसे पूर्व मुनिराजोंका समाचार कहागया है वही सब रातदिनका आचरण आर्याओंका भी यथायोग्य जानना । वृक्षमूलादियोग आर्याओंके नहीं होते ॥ १८७ ॥
वसतिकामें आर्यिकाओंका वर्ताव कहते हैं;अण्णोष्णणुकूलाओ अण्णोष्ण हिरक्खणाभिजुत्ताओ। गयरोसवेरमाया सलज्जमज्जाद किरियाओ ॥ १८८ ॥
अन्योन्यानुकूलाः अन्योन्याभिरक्षणाभियुक्ताः । गतरोषवैरमायाः सलज्जामर्यादा क्रियाः ॥ १८८ ॥
अर्थ – आर्यिका आपसमें अनूकूल रहती हैं ईर्षाभाव नहीं करतीं, आपसमें प्रति पालनमें तत्पर रहती हैं, क्रोध वैर मायाचारी इन तीनोंसे रहित होतीं हैं । लोकापवादसे भयरूप लज्जापरिणाम, न्यायमार्गमें प्रवर्तनेरूप मर्यादा, दोनों कुलके योग्य आचरण - इन गुणकर सहित होती हैं ॥ १८८ ॥
अज्झयणे परियट्ठे सवणे कहणे तहाणुपेहाए । तवविणय संजमेसु य अविरहिदुपओगजुत्ताओ ॥ १८९ ॥ अध्ययने परिवर्ते श्रवणे कथने तथानुप्रेक्षासु । तपोविनयसंयमेषु च अविरहिता उपयोगयुक्ताः ॥ १८९ ॥ अर्थ — शास्त्र पढनेमें, पढे शास्त्र के पाठ करनेमें, शास्त्र सुननेमें, श्रुतके चिंतनमें अथवा अनित्यादि भावनाओंमें, और तप