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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir भाषांतर अध्य०१३ ॥७७८॥ फरी ते चांडाळजन्म पछी हे भाइ ! आपणे देवलोक-सौधर्म देवलोकमां महोटी ऋदि युक्त देव थया. हे भाइ ! आपण बन्नेनी उत्तराध्य BE| अन्योन्य विनानी अर्थात् जे जातिमां आपणे साये रहेवानुं न यतां एक बीजाना वियोगवाळी आप्रत्यक्ष छट्ठी जाति-जन्म-. | पनसूत्रम् आ सांभळी मुनि बोल्या॥७७८॥ कम्मा नियाणप्पगडा । तुमे राय विचितिया ॥ तेसिं फलविवागेण । विपओगमुवागया ॥ ८॥ (राय) हे राजा (तुमे) तमे [कम्मा] कमों (निआणप्पगडा) नियाणावडे कर्या छे (विचितिआ) चिंतव्या छ [तेसि] ते कर्मोनो [फलविवागेण] धळपो विपाके करीने आपणे (विप्पओग) परस्पर वियोगने (उवगया) पाम्या छीए, ८ व्या०-हे राजन् ! त्वया कर्माणि विचिंतितानि, आर्तध्यानरूपाणि ध्यानानि, ध्यातानि आध्यानहेतुभूतानि are कर्माणि विचिंतितानीत्यर्थः कीदृशानि कर्माणि? निदानप्रकृतानि निदानेनोपार्जितानि, निदानेन भोगप्रार्थनावशेन | प्रकृतानि निदानप्रकृतानि प्रकर्षेण बद्धानि तेषां कर्मणां फलविपाकेन फलोदयेन आवां विषयोगमुपागतो वियोगं माप्ती.॥८॥ अथ चक्री प्रश्नं करोति हे राजन् ! तमे कर्मोनु विचितन कर्यु; आर्तध्यानरुप कर्मो चिंतव्यां; केवां कर्मो? निदानप्रकृत अर्थात् नियाणा [भोग मार्थना] बढे प्रकर्षथी बद्ध एवां ते कर्मोना फलविपाक-फळना उदय-बडे आपणे बेय वियुक्त थया. ८ संचसोअप्पगडा । कम्ता मेए पुग कडा ॥ते अज परिभुजामो । किंY चित्तवि से तेहा ।। ९॥ (मए) में (पुरा) पूर्वभवमा (सचसोअप्पगढा) सत्य भने शौच करनार अनुष्ठान (कम्मा) कर्मो कडा कर्या हता (ते) ते कर्मोना For Private and Personal Use Only
SR No.020856
Book TitleUttaradhyayan Sutram Part 03
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorLakshmivallabh Gani
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1936
Total Pages291
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size17 MB
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