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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir भाषांतर अध्ययन५ अर्थः-काय-शरीरे तथा वचने मत्त; अर्थात् शरीरना मदयी जीवोने दमे तथा वचनना मदथी लोकोने तरछाडे, विशधनमा उत्तराध्य- | गृद्ध एटले अति लोभी पुनः स्त्रीओमां पण गृद्ध-लोलुप कायाना मदमां ज्यां त्यां'हुरूपवान् ' 'हुँ बलवान ' एम कहेतो पन सत्रम् २ फरे, तेम वचन मदमां'वक्ता''हुँ विद्वान् ' इत्यादिक पोतानाज गुण गाया करे, मदोन्मत्त बनी सर्वत्र 'हुंज धारणादि॥३६५॥ शक्तिमान् छु' आम मनमा चिंतन करतो दुहुनोति चेय प्रकारे रागद्वेषवडे मलनो संचय करे छे, केनी पेठे जेम शिशुनाग=अणशिया (द्वींद्रियजीवविशेष ) चोमासामा नीक के जेने भूनाग कहे के ते चेय प्रकारे मृतिकानोज संचय करे छे. तेनुं शरीर | बहु सुंचालु होय छे तेथी बहार माटीथी लीपातो जाय छे अने अंदर पण माटी खातो जाय छे. अने मृत्तिकाथी बहार नीकळे | तो मूर्यना तापथी सुकाय अने तरफडीने विनाश पामे एटले विनाश पामीने पण माटीमांज उमेरो करे छे तेम ए मूर्ख पण | Jt | कर्ममलनेज वधारे छे एज कर्भवडे पोते उत्पन्न थाय छे पाछो कर्ममलनीज वृद्धि करतो रहे छे. ॥१०॥ तेओ पुटो आयंकेणं । गिलाणो परिप्पड़ ॥ पंभीओ परलोगैस्स । कमाणुप्पेहि अप्पणो ॥ ११ ॥ | मूलार्थ:-तिओ) पछी (आयंकण)-मृत्य करनारा रोगवडे (पुठो पराभव पामेलो. तथा (गिलाणो)-ग्लान, तथा (परलोगम्स)-परलोकथी भय पामेलो, तथा (अपणो) पोताना (कम्माणु-पेहि अशुभकर्मनो विचार करतो ते मनुष्य पिरितप्पड़ खेद पामे छे. ११ ___व्या०-ततोऽष्टकर्ममलसंचयादनंतरमातंकेन रोगेण स्पृष्टः सन् ग्लानः ग्लानि प्राप्तः परितप्यते परिखिद्यते परलोकात्मभीतः, कथंभूतः सः? आत्मनः कर्मानुपेक्षी यदा रोगादिग्रस्तो भवति तदा स्वयं जानाति मम कर्मणां |विपाको जाप्तः. मया पुरा यान्यशुभानि कर्माणि कृतानि तमादहं परलोकोऽपि दु:ग्वी भविष्यामि, इति स्वकृतक For Private and Personal Use Only
SR No.020855
Book TitleUttaradhyayan Sutram Part 02
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorLakshmivallabh Gani
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1935
Total Pages290
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size15 MB
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