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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ६०६ www.kobatirth.org न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् सह Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir [ गुणेऽनुमाने निदर्शन दृष्टस्य निदर्शनेऽनुमेय सामान्येन लिङ्गसामान्यमनुमेन्वानयनमनुसन्धानम् । अनुमेयधर्ममात्रत्वेनाभिहितं लिङ्गसामान्य निदर्शन ( उदाहरण ) में साध्य सामान्य के साथ ज्ञात हुए लिङ्ग ( हेतु ) सामान्य की सत्ता का पक्ष में बोध करानेवाला वाक्य ही साधर्म्या - नुसन्धान' ( साधर्म्यापनय ) है । ( विशदार्थ यह है कि ) लिङ्गसामान्य पक्ष ( अनुमेय ) में है' इस प्रकार केवल पक्षमात्रवृत्तित्व रूप से कथित हेतु न्यायकन्दली मिति । एवं च न व्याप्तिरस्ति, आकाशस्य क्रियारहितत्वेऽपि द्रव्यत्वात् । तस्माद् विपरीतव्यावृत्तोऽयं वैधर्म्यनिदर्शनाभासः । लिङ्गं चानुमेयं चोभयं च लिङ्गानुमेयोभयानि तान्यव्यावृत्तानि येषां ते तथोक्ताः । आश्रयोऽसिद्धो यस्य स आश्रयासिद्धः, लिङ्गानुमेयोभयाव्यावृत्तश्चाश्रयासिद्धश्च अव्यावृत्तश्च विपरीतव्यावृत्तश्चेति व्याख्या । निदर्शनेऽनुमेयसामान्येन सह दृष्टस्य लिङ्गसामान्यस्यानुमेयेऽन्वानयनमनुसन्धानम् । निदश्यते निश्चिता साध्यसाधनयोर्व्याप्तिरस्मिन्निति निदर्शनं दृष्टान्तः, तस्मिन्ननुमेयसामान्येन सह दृष्टस्य प्रतीतस्य लिङ्गसामान्यस्यानुमेये साध्यधमण्यन्वानयनं सद्भावोपदर्शनं येन वचनेन क्रियते तदनुसन्धानम् । जिसमें क्रिया नहीं है, वह द्रव्य ही नहीं है, किन्तु ऐसी व्याप्ति नहीं है, क्योंकि आकाशादि द्रव्य तो हैं, किन्तु उनमें क्रियावत्त्व नहीं है । अतः प्रकृत अनुमान में 'यनिष्क्रियं तदद्रव्यम्' यह वाक्य विपरीतव्यावृत्त' नाम का वैधर्म्य निदर्शनाभास होगा । 'लिङ्गानुमेयोभयाव्यावृत्ति' शब्द 'लिङ्गश्वानुमेयं चोभयं च लिङ्गानुमेयोभयानि, तान्यव्यावृत्तानि येषाम्' इस व्युत्पत्ति से बना है, और 'आश्रयोऽसिद्धो यस्य' इस व्युत्पत्ति से प्रकृत 'आश्रयासिद्ध' शब्द बना है । ( इस प्रकार दोनों शब्दों के निष्पन्न होने के बाद ) 'लिङ्गानुमेयोभयाव्यावृत्तश्चाश्रयासिद्धश्चाव्यावृत्तश्च विपरीत व्यावृत्तश्च' इस व्युत्पत्ति के अनुसार व्याख्या करनी चाहिए । For Private And Personal निदर्शनेऽनुमेयसामान्येन सह दृष्टस्य लिङ्गसामान्यस्यानुमेयेऽन्वानयनमनुसन्धानम्' इस वाक्य में प्रयुक्त 'निदर्शन' शब्द का 'निर्दिश्यते निश्चिता साध्यसाधनयोर्व्याप्तिरस्मिन्निति निदर्शनम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार पर्यायवाची 'दृष्टान्त' शब्द है । तदनुसार दृष्टान्त में साध्य सामान्य के साथ दृष्ट अर्थात् ज्ञात लिङ्ग ( हेतु ) सामान्य का अनुमेय में अर्थात् साध्य के धर्मी में ( पक्ष में ) ' अन्वानयन' अर्थात् सत्ता का प्रदर्शन जिस वाक्य के द्वारा किया जाय वही 'अनुसन्धान' है । ' अनुसन्धीयते अनेन' इस व्युत्पत्ति के अनुसार दृष्टान्त में साध्य की व्याप्ति से युक्त एवं उसी रूप में देखे हुए हेतु
SR No.020573
Book TitlePrashastapad Bhashyam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreedhar Bhatt
PublisherSampurnanand Sanskrit Vishva Vidyalay
Publication Year1977
Total Pages869
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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