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व्यास
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व्यास
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( आदि०६१ । १-२ ) । व्यासजीके कहे हुए इस पश्चम वेदरूप महाभारतको कार्णवेद' कहते हैं। जो इसका श्रवण कराता है, उसे अभीष्ट अर्थकी प्राप्ति होती है। यह जय नामक इतिहास है । इसकी महिमाका विस्तृत वर्णन ( आदि० ६२ । १८-४१)। मुनिवर व्यास प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर स्नान-संध्या आदिसे शुद्ध हो महाभारतकी रचना करते थे । इन्होंने तपस्या और नियमका आश्रय ले तीन वर्षोंमें इस ग्रन्थको पूरा किया था ( आदि. ६२ । ४१-४२)। माता सत्यवतीने पराशर जीके संयोगसे तत्काल ही यमुनाके दीपमें इनको जन्म दिया था। इसीलिये ये पाराशर्य और द्वैपायन कहलाये । इन्होंने मातासे आशा लेकर तपस्यामें ही मन लगाया और मातासे कहा, आवश्यकता पड़नेपर तुम मेरा स्मरण करना, मैं अवश्य दर्शन दूंगा ( भादि. १३ । ८४-८५)। वेदोंका व्यास (विस्तार) करनेके कारण ये बेदण्यास नामसे विख्यात हुए ( आदि. ६३४८८)। इनोंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और पञ्चम वेद महाभारतका अध्ययन सुमन्तु, जैमिनि, पैल, शुकदेव तथा वैशम्पायनको कराया ( आदि. ६३ । ८९-९.)। इनके द्वारा अम्बिका और अम्बालिकाके गर्भसे राजा धृतराष्ट्र और महाबली पाण्डुका जन्म हुआ और इन्हीसे ही शूद्रजातीय स्त्रीके गर्भसे विदुरजी उत्पन्न दुए; जो धर्म-अर्थके ज्ञानमें निपुण, बुद्धिमान, मेधावी और निष्पाप थे ( भादि० ६३ । ११३-१४)। सत्यवतीद्वारा व्यासका आवाइन और व्यासजीका माताकी आज्ञासे विचित्रवीर्यकी पत्नियोंके गर्भसे संतानोत्पादन । करनेकी स्वीकृति देना (आदि०१०४।२४-१९)। इनके द्वारा विचित्रवीर्यके क्षेत्रसे धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरकी उत्पत्ति तथा माताके पूछनेपर इनका उन पुत्रोंके भाषी गुणों और लक्षणों का वर्णन (भादि० १०५ भवाब)। इनका गान्धारीको सौ पुत्र होनेका वरदान देना ( भादि. १४.)। इनके द्वारा गान्धारीके लिये उसके गर्भसे गिरे हुए मांसपिण्डसे सौ पुत्र होनेकी व्यवस्था (आदि. ११४ । १७-२४ )। इनका मांसपिण्डके एक सौ एक भागसे गान्धारीके लिये एक पुत्री होनेका आश्वासन देना और उसे भी घृतपूर्ण घटमें स्थापित करना ( भादि. ११५ । १५-10)। वनमें व्यासजीका कुन्तीसहित पाण्डवोंको दर्शन और आश्वासन देना (आदि. १५५।५-१९)। इनका पाण्डवोंको पुनः दर्शन देकर द्रौपदीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाना और उसके इन सबकी पत्नी होनेकी बात बताकर इन्हें पाचाडकी राजधानीमें जाने के लिये आदेश देना (मादि. १६८ अध्याष )। जिसे देवलोक-
में अलकनन्दा कहते हैं, वही इस लोकमें आकर गङ्गा नाम धारण करती है-यह कृष्णद्वैपायनका मत है ( आदि० १६९ । २२)। द्रुपदकी राजधानीकी ओर जाते हुए पाण्डवोंसे मार्गमें इनकी भेंट और परस्पर स्वागतसत्कार के बाद वार्तालाप ( आदि. १८४ । २.३)। व्यासजीके समक्ष द्रौपदीका पाँच पुरुषोंसे विवाह होनेके विषयमें द्रुपद, धृष्टद्युम्न और युधिष्ठिरका अपने-अपने विचार व्यक्त करना तथा असत्यसे डरी हुई कुन्तीको इनका आश्वासन देना (आदि. १९५ अध्याय)। इनका द्रुपदको पाण्डवों तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मकी कथा सुनाकर उन्हें दिव्य दृष्टि देना (आदि०१९६ । १-३८)। द्रौपदी स्वर्गकी लक्ष्मी है और पाँचों पाण्डवोंकी पत्नी नियत की गयी है--इस बातका द्रुपदको निश्चय कराना (भादि. १९६ । ५१-५३) । श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास युधिष्ठिरकी सभामें विराजमान होते थे (सभा० ४ । ११)। इनका अर्जुनको उत्तर, भीमसेनको पूर्व सहदेवको दक्षिण और नकुलको पश्चिम दिशामें दिग्विजयके लिये जानेका आदेश (सभा. २५ । के बाद दा. पाठ, पृष्ठ ७४२)। इनका युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें ब्रह्माका कार्य सँभालना (सभा०३३ । ३४)। राजसूय यशके अन्तमें युधिष्ठिरके प्रति भविष्यवाणी सुनाना (सभा०४६ । १-१७)। इन्होंने राजसूय यज्ञके अन्तम युधिष्टिरका अभिषेक किया (सभा० ५३ । १.)। इनका धृतराष्ट्रसे दुर्योधनके अन्यायको रोकनेके लिये अनुरोध ( बन०
२३ से वन० ८ अध्यायतक)। इनके द्वारा सुरभि और इन्द्र के उपाख्यानका वर्णन तथा पाण्डवोंके प्रति दया दिखाना ( बन० ९ अध्याय)। धृतराष्ट्रको मैत्रेयके आगमनकी सूचना देकर इनका प्रस्थान (वन. १०।४-4)। इनका दैतवनमें पाण्डवोंके पास जाना
और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृति विद्याका दान करना (म. ३६। २४-१८)। कुरुक्षेत्रकी सीमाके अन्तर्गत एक मिभकतीर्थ है, जहाँ महात्मा ब्यासने दिजोंके लिये सभी तीर्थोंका सम्मिश्रण किया है। आगे चलकर व्यासवन है
और इससे भी आगे व्यासस्थली नामक एक स्थान है, जहाँ बुद्धिमान् व्यासने पुत्रशोकसे संतप्त हो शरीर त्याग देने का विचार किया था ( वन० ८३ । ९१-९७)। पाण्डवोसे दान-धर्मके प्रतिपादनके प्रसंगमें मुद्गल ऋषिकी कथा सुनाना (वन० अध्याय २६० से २६१ तक)। धृतराष्ट्रसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताने के लिये संजयको आदेश (उद्योग०६७।१०)। इनकाधृतराष्ट्रको समझाना(उद्योग०६९।११-१५)। इनके द्वारा संजयको दिव्य-रधि-बान (भीष्म० २..)। पतराष्ट्रसे भयंकर उत्पातौका वर्णन करना (भीम० २।१६ से भीष्म०।।
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