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________________ कला २३११ कलानुश ५ [बं०] केला। कलाज.., कलाजह-[फा०] महोखा पक्षी ।अक़अका [फा०] मेंढक । मंडूक। क़लाज़-[ ? ] श्राज़रबूयः। कला-[अ०] सजी । किली। कलाजाजी-संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री.] कलौंजी । मँगकलाअजारह-[ असनहानी] महोखा पक्षो। अक़- रैला । कारवी । कृष्णजीरक । शन। कलाजाती-संज्ञा स्त्री० [?] गोलशाम । कलाई-संज्ञा स्त्री० [सं० कलाची ] (1) पहुँचा । कलाजाह-[?] (१) एक प्रकार का कौश्रा (२) मणिबंध । मणि। साइद। ज़िरा-अ० । महोखा पक्षी | अक्रमक । (Wrist)। कलाटक-संज्ञा पुं॰ [सं० पु.] गरुड़ शालि । एक संज्ञा स्त्री० [सं० कुलत्थ ] उरद । माष । धान । रा०नि०व०१६ । कलाकंद-संज्ञा पुं० [फा०] एक प्रकार की बरफ़ी कलाटीन-संज्ञा पु० [सं० पु.] खंजन पक्षी । (मिठाई ) जो खोए और मिस्री की बनती है। हारा०। कलाकमूश-संज्ञा पुं० [फा०] जंगली चूहा । क़लात-[अ०] मछली। कलाकार-संज्ञा पुं० [सं० पु.] अशोक की तरह | कलातयूर-[?] शामी कर्नब । कुम्बीत । का एक पेड़, जो बंगाल और मदरास में होता है । कलातानस-[?] चुनार । चिनार का पेड़ । इसे कहीं कहीं 'देवदारी' भी कहते हैं। कलातानूस-[?] कुलथी। कलाकरा-संज्ञा पुं॰ [देश॰] एक प्रकार का शरीफ़ा कलाद (क)-संज्ञा पुं० [सं० पु.] सोनार । जिसकी पत्ती बड़ी होती है। जायफल का एक स्वर्णकार । त्रिका। भेद । [फा०] मेंढ़क । मंडूक । कलाक़ल-[अ० ] हब्ब कुलकुल । चकवड़ । पमाड़। कलादः, कलादू-[फा० ] मेंढ़क । मंडूक । कलाकला-१] लोन कबीर । कलाधिक-संज्ञा पुं॰ [सं० पु.] मुर्गा । कुक्कुट । कलाकलीतस-[यू.] अकलीमिया । कलान-[ तु.] जंगली गदहा । गोरखर । कलाकल्या-संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री.] कलान-[बर० ] कसौंदा । कासमई । कलाक़ी-[?] (१) माहता। पंडुक । (२) कलानुनादी-संज्ञा [सं० पु. कलानुनादिन् ] (१) फ्रास्ता की तरह का एक पक्षी। गौरैया । चटक । कलविक । (२) चातक । कलाकुल-संज्ञा पुं० [सं० क्री.] हलाहल विष । पपीहा । (३) भौंरा । भ्रमर । मे० नषटकं ।(४) रा०नि० व०६। (४) कपिञ्जल । कलाकेलि-संज्ञा पुं॰ [सं० पु.] कामदेव । कंदर्प । क़लान्नश-[?] एक वनस्पति जिसको 'खोखल्मरूज' वि० [सं० त्रि.] विलासी। कहते हैं । इसका कारण यह है कि यह रंग में कलाखै वाऊ-[ वर० ] चूका। खोन अर्थात् प्राड़ की तरह होता है। इसकी कलांकुर-संज्ञा पुं० [सं० पु.] The bird पत्ती एवं शाखाएँ भी उससे सादृश्य रखती हैं। Ardea Sibirica, कराँकुल पक्षी । सारस भेद केवल यह है कि इसकी पत्ती पाड़ की पत्ती पक्षी । त्रिका से किंचित् छोटी तथा चौड़ी होती है। इसमें कलांगुलि-संज्ञा पुं० [सं० पु.] एक प्रकार का गाँठे पास-पास होती हैं। डालियाँ भूमि पर शालि धान । च० सू० २७ १०। आच्छादित होती हैं। इसमें चेंप होता है और कलाचक-[फा०] कौड़ी। इसका स्वाद फीका होता है। कलाचिका, कलाची-संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री०] गुण-धर्म-इन्नवेतार के अनुसार इसका रस कलाई । प्रकोष्ठ । हे० च० । (२) घोड़ेका घुटने | पीने से सीने से थूक में खून का .लमा बंद हो से आगे का भाग। अश्व के जानु वा घुटने का जाता है । इसकी वर्ति योनि में धारण करने से अगला भाग । ज.द.२०॥ खून का आना बंद हो जाता है। गुणधर्म में यह
SR No.020062
Book TitleAayurvediya Kosh Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamjitsinh Vaidya, Daljitsinh Viadya
PublisherVishveshvar Dayaluji Vaidyaraj
Publication Year1942
Total Pages716
LanguageGujarati
ClassificationDictionary
File Size24 MB
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