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________________ ૧ द्वारा अनुसन्धान कराने निर्णयनी नजीकमां जरूर जई शकीए छीए. त्यारे थोडोक विचारविमर्श करोए: जो बने युग शब्दनो अर्थ चार चार करोए तो १७४४नी सालमां सुरतना नातुर्मासमां बने स्वाध्यायोनी रचना करो " एम निश्रित थाय. एटले जैन साधुना नियम मुजब कार्तिक मुदि नौद्रस सुधी (चातुर्मास समाप्तिदिन) त्यां ज रह्या हता ते सुनिधित थयुं. हवे पादुका उपरना लेखमां १७४५नी साल अने मागसर सुदि ११ नी अंजनशलाका ने ते राजनगर - अमदावादमां कर्यानुं जणायुं छे. मनो देह डभोईमां ज पड्यो ते वात सुनिश्रित है. सुरतनुं १७४४ नुं चातुर्मास कार्तिक सुदि चौदसे पूर्ण थाय. एटले बहेलामां बहेलो बिहार कार्तिक सुदि पूनमे करी शके. पूनमे विहार करो मई तरफ प्रयाण होय एम मानीए तो पूनम अने पादुकानी अंजन-प्रतिष्ठा (तेय अमदावादमां) वचनो गाळो मात्र २७ दिवसनो छे. अहींयां विचारवानुं ए छे के, आटल्य दिवसोमां, ते एकाएक बिहार करे, सुरतथी ८० माईल दूर डभोई आयी पहोंचे, तुरतातुरत अनशन करवाना संयोगो ऊमा थाय; कालधर्म पामे; अने पाटा रेलगाडी के मोटरना साधन विनाना जमानामा अमदावाद समाचार पहोची जाय, संगेमरमरनी कमलासनस्थ पादुका पण बनी जाय, अने अंजनथई जाय - आ वधुं संभवित लागे छे खरं ! मारो अंगत जवाब तो 'ना' हे छतांग घडीमर मानो के संभावित छे, तो पछी डभोईमां चातुर्मास कर्यानी कई साल नक्की करवी ! आ वधी चिपमापत्ति टावा युगयुगनो अर्थ चार न करतां जो वे करीए वधी समापत्ति थई जाय. जोके युगयुगधी तो २२, २४, ४२, ४४ आम चार विकल्पो कल्पी शकाय छे. उतांय चीजां पुरावा-साधनो तपासवा अने विचारविनिमय करवा माटेनां द्वारो खुल्लां ज छे. उपाध्यायजी अंगेनी केटीक बायतो साफसूफी ने परामर्श मागी रही है, तेमांथी महत्वनी बाबतो हुं रजू करु धुं. १- " उपाध्यायजी काशी गया त्यारे विनयविजयजी तेमनी साथै गया हता यांना श्रावण भट्टाचार्य जैनमुनिने भणावे तेम न हता, तेथी ते चंने साधुओ नामांतर अने वेषांतर करीने वा 'चिंतामणि ' नामनो न्यायप्रन्थ गुरुनी गेरहाजरी मां गुरुपत्नी पांसेगी मागीने एकरातमां ने जणाए कंटस्थ करो लीधो"- आवो जे किंवदन्ती चाली भावी है ते तद्दन खोटी ए. श्रीयशोविजयजी साथै तमना गुरु श्रीनयविजयजी ज गया हता. पण 'नयनी आगळ 'वि' वधीने 'विनय' विजय चनी गयुं छे. अन्य स्थळे पण 'श्रीनयविजय 'मांनो 'श्री' बराबर न बनावाथी, समगा के माध 'श्री'ने ठेकाणे 'वि' यांनीने विनयविजय करी नांख्यं मे बाकी अनेक पुरावानी हीन निचित छे के उपाध्यायजी साधे नगविजयजीज हता. बळी विजयी चिनयविजयजी न जताए सुनिधित योना है. एटले आव दन्तकथाओ ननदिनी पन के योनीचं त्री जोईए. बीजु काशीगमनमां गुरु, शिष्य साधे अन्य कया कया निरीहता ! * આ વાતની સાક્ષી ઉપાખ૪ના માની અને પ્રાના બાપે છે.
SR No.010845
Book TitleYashovijay Smruti Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay
PublisherYashobharti Jain Prakashan Samiti
Publication Year1957
Total Pages505
LanguageHindi
ClassificationSmruti_Granth
File Size25 MB
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