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________________ महामहोपाध्याय, श्री यशोविजयजी कृत. व्याख्या-घणा लोकमांहे भरतादिकनां चरित्र भणीने के० कहीने एटले भरतादिके शो क्रिया व्यवहार पाल्यो ? केवल आत्मशुद्धिएज केवलज्ञान पाम्या, तो व्यवहारनो शो परमार्थ ? ए, प्रकाशी, जे शुभ व्यवहारने लोपे ते निज के पोतानी बोधीने हणे. " आहच्च भावकहणे, पंचहि गणेहि पासत्था " इति (आवश्यक नियुक्त) वचनात् ॥ ६१॥ बहु दल दीसे जीवनांजी, व्यवहारे शिवयोग । छींडी ताके पाधरोजी, छोडी पंथ अयोग ॥ सो० ॥३२॥ व्याख्या-बहु दल के० घणां द्रव्य जीवनां व्यवहारे शिवयोग्य दीसे छे, तेणे करी व्यवहार क्रिया ते राज मार्ग छे. ए पाघरो मार्ग छांडीने जे छींडी ताके एटले गली कुंचीनो रस्तो शोधवा जाय ते अयोग्य कहीए. भरत मरुदेव्यादिकनुं आलंवन सामान्ये न करवं. उक्तंच-" गिहिसंयचमहत्तो" इत्यादि. ॥ ६२ ॥ आवश्यकमांहे भाखिओजी, एहज अर्थ विचार । फल संशय पण जाणतांजी, जाणीजे संसार ॥ सो० ॥६॥ व्याख्या-एहज अर्थनो विचार आवश्यक मांहे भाष्यो छे के जे, भरतादिक आलंबन लेइ क्रियाने स्थापे छे, ते क्रिया अदृष्टव्य मुख छे. क्रिया करता फल होशे के नहीं. होय? ए संशय केम टछे ? ते उपर कहे छे. जे फल संशय जाणतां पण संसार जाणीए. उक्तंच-श्री आचारांगे (पंचम अध्ययने). " संसय परिआणओ संसारे परिभाए भवति संसयं अपरिआणओ संसारे अपरिबाए भवति । " इति. “ कृष्यादौ फलसंशयेपि, यथोपायबनिश्चयात् । प्रवृत्तिस्तथा धर्मेपि, इति न्यायानुसारिणः ॥ १" ॥ ६३ ॥ ॥ काल बट्ठी॥ मुनि मन सरोवर हसलो अथवा ऋषभनो घंश रयणायरू-ए देशी. अवर इस्यो नय सांजली, एक ग्रहे व्यवहारोरें। मर्म द्विविध तस नवि लहे, शुद्ध अशुद्ध विचारोरे ॥६॥ तुज विण गति नहीं जंतुने, तुं जग जंतुनो दीवारे। जीवीए तुज अवलंबने, तुं साहेब चीरं जीवोरे ॥ तुज ॥६५॥
SR No.010663
Book Title125 150 350 Gathaona Stavano
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDanvijay
PublisherKhambat Amarchand Premchand Jainshala
Publication Year
Total Pages295
LanguageGujarati, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Worship, & Religion
File Size14 MB
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