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२४ : सस्कृत-प्राकृत व्याकरण और कोग की परम्परा
कार नही।
साधु-साध्वियो को वगाल मे भेजने का अवसर आचार्यवर के सामने नही आया। पर सुदूर क्षेत्रो मे उन्हें भेजने का मार्ग खुल गया। बबई, पूना आदि क्षेत्रो मे साधु गए उसके पीछे इस धारणा का योग अवश्य होना चाहिए कि जहा ज्ञान, दर्शन और चारित्र की वृद्धि हो वहा किसी भी क्षेत्र मे मुनि विहार कर सकते हैं।
(२) वार्मिक पुस्तको का प्रकाशन पहले से ही होता रहा है। पर व्यवस्थित रूप मे सपादित होकर पुस्तक प्रकाशन आचार्यवर के समय से ही प्रारभ हुआ। गुलाबचन्द जी लूणिया (जयपुर) आचार्य के युग मे एक विशिष्ट श्रावक थे । उन्होने श्री जयाचार्य रचित प्रश्नोत्तर-तत्व-बोध का सम्पादन किया। उसका प्रकाशन हीरालाल जी आचलिया (गंगाशहर निवासी) ने किया। श्री जयाचार्य का एक दूसरा महत्वपूर्ण अन्य है भ्रम विध्वसन । उसमे तेरापथ के सैद्धान्तिक पक्ष १. बहुत सूक्ष्म प्रतिभा से प्रतिपादन किया गया है। उसका प्रकाशन वेला (कच्छ) के श्रावक मूलचन्द जी कोलवी ने कराया था। वे तपस्वी और आस्थावान् श्रावक थे। उन्होने 'भ्रम विध्वंसन' देखा। उन्हें बहुत महत्वपूर्ण ग्रन्थ लगा। उन्होने साधुओ के पुठे से उसकी प्रति निकाल ली और उसे प्रकाशित कर दिया। पर, वह बहुत ही अशुद्ध रूप मे प्रकाशित हुआ।
सं० १९७६ मे आचार्यवर का चतुर्मास वीकानेर मे था। उस समय सैद्धान्तिक चर्चाओ का दौर चलता था। भ्रम विवसन की बहुत उपयोगिता थी। तब अनायास ही उसके सपादन की ओर ध्यान आकर्षित हुआ। आचार्यवर ने अपने शिष्य मुनि चौयमलजी आदि को उसके मपादन का आदेश दिया। उन साधुओ ने प० 'घुनन्दनजी के सहयोग से उसका सपादन किया। ईसरचन्दजी चोपडा ने उसे प्रकाशित करवाया। वह उस समय की सुसपादित पुस्तक है । उसका चर्चा वार्ता मे बहुत उपयोग हुआ।
इन शताब्दियो मे आगम-सूत्रो को ८वे के माध्यम से पढ़ने की प्रवृत्ति चल रही थी। आचार्यवर ने सस्कृत टीकाओ के माध्यम से आगम पढने शुरू किए। वे बहुत बार कहने थे केवल शब्दार्थ से काम नही चलता। उसका तात्पर्य समझना चाहिए । वह समझने के लिइटीकाए पढना बहुत आवश्यक हैं।