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________________ अपूर्वकरण- प्रविष्ट चारित्र मोहक्षपणाप्रस्थापक स्थितिघात आदि क्रियाविशेषका निरूपण निवृत्तिकरणप्रविष्ट चारित्रमोहक्षपकआवश्यका निरूपण निवृत्तिकरण क्षपकके बंधनेवाले कर्मोंके स्थितिबन्ध-सम्बन्धी अल्पबहुत्वोंनिरूपण अनिवृत्तिकरण क्षपकके सम्भव सत्कर्मोंके स्थिति सत्त्वों का अल्पव आठ मध्यम कषायोंके और निद्रानिद्रादि सोलह प्रकृतियोंके क्षपणका विधान चार संज्वलन और नव नोकषाय इन तेरह कर्मोंके अन्तरकरणका विधान नपुंसकवेद और स्त्रीवेदके क्षपणका विधान सात नोकषायके क्षपकके स्थितिबन्धका अल्पबहुत्व ग्रन्थकारद्वारा संक्रमण - प्रस्थापककी विशेष क्रियाओं का निरूपण अपवर्तन का अर्थ आनुपूर्वी संक्रमणका स्वरूप संक्रमण-प्रस्थापकके बन्ध, उदय और संक्रमणके समानता और असमाताका वर्णन अनुभाग और प्रदेश- सम्बन्धी बन्ध, उदय और संक्रमण -विषयक स्वस्थान- अल्पबहुत्वका निरूपण अन्तरकरण करनेवाले क्षपकके स्थिति और अनुभाग के उत्कर्षण और अपकर्षणा विधान अपवर्तित द्रव्यके निक्षेप, प्रतिस्थापना आदिका निरूपण अपकर्षित, उत्कर्षित और संक्रमित द्रव्य के उत्तरकाल में वृद्धि हानि और अवस्था का वर्णन जघन्य - उत्कृष्ट निक्षेप और अतिस्थापाके प्रमाणका वर्णन विषय-सूची ७४१ ७४३ ७४५ ७४८ ७५१ ७५२ ७५३ ७५४ ७५६ ७६१ ७६४ ७६८ ७७१ ७७३ ७७४ ७७७ ७७६ उत्कर्षित या पकर्षित स्थितिका बध्य मान स्थिति के साथ हीनाधिकताका निरूपण वृद्धि, हानि और अवस्थान संज्ञाओंका स्वरूप और उनका अल्पबहुत्व अश्वकर्णकरणका विधान अपूर्वस्पर्धक करने का " पूर्वस्पर्धकोंका अल्पबहुत्व द्वितीयादिसमयवर्ती अश्वकर्णकरण - कारककी विशेष क्रियाओंका निरूपण अश्वकर्णकरणकारकके अन्तिमसमय में स्थितिबंध और स्थितिसत्त्वका अल्पबहुत्व कृष्टिकरणकालका निरूपण प्रथम समय में की गई कृष्टियों की तीव्र-मन्दताका अल्पबहुत्व कृष्टि-अन्तरोंका अल्पबहुत्व कृष्टिकरणकाल के अन्तिम समय में स्थितिबंध और स्थितिसत्त्वका अल्पबहुत्व प्रन्थकारद्वारा कृष्टियों-सम्बन्धी पृच्छाओंका उद्भावन और उनका समाधान कृष्टि वेदक के प्रदेशा निरूपण कृष्टिवेदक के उदयस्थिति-सम्बन्धी यवमध्य-रचनाका ७७ उदयस्थितिसम्बन्धी प्रदेशाग्रोंका अल्पबहुत्व कृष्टिवेदक पूर्वभवों में बाँधे हुए कर्मोंका गति आदि मार्गणाओं में भजनीय अभजनीयताका वर्णन कृष्टि॒िवेदकके एक समयबद्ध और भववद्ध कर्मों का वर्णन : ७८२ ७८५ ७८७ ७८६ ७६० ७६४ ७६७ " ७६८ ७६६ अनुभाग और प्रदेशोंकी अपेक्षा कृष्टियोंकी हीनाधिकताका वर्णन ८११ प्रथम समयवर्ती कृष्टियोंके स्थितिसत्त्वका निरूपण ८०३ ८०५ =१६ ८१७ ८१८ ८२० ८२६
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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