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________________ ७६ कसायपाहुडसुत्त ७२६ चारित्रमोहोपशामना अधिकार ६७६-७३७ उपशान्तकषायगुणस्थानसे गिरनेका उपशामना कितने प्रकारकी होती है, सकारण निरूपण ७१४ किस-किस कर्मका उपशम होता है, गिरनेवाले सूक्ष्मसाम्परायिकसंयतकी और कौन-कौन कर्म उपशान्त या विशेष क्रियाओंका वर्णन ७१५ अनुपशान्त रहता है,इत्यादि प्रश्नों गिरनेवाले बादरसाम्परायिक संयतकी का ग्रन्थकारद्वारा उद्भावन और विशेष क्रियाओंका विधान ७१६ समाधान उक्त जीवके सम्भव स्थितिबन्धोंके अल्प चारित्रमोह-उपशामक वेदकसम्यग्दृष्टि बहुत्वोंका निरूपण ___ की विशेष क्रियाओंका वर्णन ६७८ गिरनेवाले बादर साम्परायिकसंयतके क्षायिकसम्यग्दृष्टि-उपशामककी विशेष मोहनीय कर्मका अनानुपूर्वीसंक्रम, क्रियाओंका वर्णन ६८१ तथा ज्ञानावरणादि-कर्मोंकी प्रकधारित्रमोहोपशामकके अपूर्वकरण तियोंके सर्वघाती होनेका विधान ७२२ और अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें गिरनेवाले अपूर्वकरणसंयतके प्रगट होनेहोनेवाले स्थितिबंध आदिका वर्णन ६२ वाले करणोंका, सम्भव प्रकृतियोंकी अन्तरकरणके अनन्तर प्रथम समयमें उदीरणा और बन्धका विधान ७२५ एक साथ प्रारम्भ होनेवाले सात गिरनेवाले अधःप्रवृत्तसंयतकी विशेषक्रियाविशेषोंका वर्णन ६६० क्रियाओंका वर्णन छह श्रावलियोंके व्यतीत होने पर ही पुरुषवेद और मानके उदयके साथ श्रेणी क्यों उदीरणा होती है इस चढ़नेवाले जीवको विभिन्नताओंका प्रश्नका सकारण निरूपण ६६१ वर्णन ७२७ स्त्रीवेदके उपशमनका विधान ६६४ पुरुषवद आर मायाक साथ श्रेणी चढ़नेसात नोकषायोंके उपशमनका " वाले जीवकी विभिन्नताओंका वर्णन ७२६ प्रथमसमयवर्ती अवेदी उपशामकके पुरुषवेद और लोभके साथ श्रेणी चढ़नेस्थितिबंध आदिका निरूपण ६६७ वाले जीवकी विभिन्नताओंका वर्णन - .. अनुभागकृष्टियोंका ७३० " ७०२ कृष्टियोंकी तीव्रमन्दताका अल्पवहत्व ७०३ नपु सकवेद के उदयके साथ श्रेणी चढने वाले उपशामककी विभिन्नताओंका कृष्टिकरणकालका निरूपण वर्णन ७३१ प्रथम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक उप___ शामककी विशेष क्रियाओंका वर्णन ७०४ पुरुषवेद और क्रोधके साथ श्रेणी चढ़नेउपशान्तकपाय वीतरागसंयतकी विशेष वाले प्रथमसमयवर्ती अपूर्वकरणक्रियाओंका वर्णन संयतसे लेकर गिरनेवाले चरम ७०५ उपशामनाके भेद-प्रभेदोंका निरूपण ७०७ समयवर्ती अपूर्वकरणसंयतके सम्भव उपशमन-योग्य कर्मोका निरूपण मध्यवर्ती पदोंका अल्पवहुत्व ७३१-७३७ ७०६ स्थिति, अनुभाग और प्रदेशोंकी अपेक्षा चारित्रमोहक्षपणा-अर्थाधिकार ७३८-८६६ __ उपशामकके उदय-उदीरणा आदि चारित्रमोह-क्षपकके परिणाम, योग, पदोंका अल्पबहुत्व उपयोग, लेश्या आदिका वर्णन ७३८ आठ प्रकारके करणोंका निर्देश और चारित्रमोहका क्षपण करनेके पूर्व ही बन्ध कौन करण कहाँ विच्छिन्न होजाता और उदयसे व्युच्छिन्न होनेवाली है इस बातका निरूपण ७१२ प्रकृतियोंका वर्णन ७३६
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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