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________________ 50 कृवेिदक के बध्यमान कर्मप्रदेशाप्रोका कृष्टियों में संक्रमणको सम्भवताका वर्णन विवक्षित स्थितिविशेष और अनुभागविशेषों में भववद्धशेष और समयप्रवद्धशेष प्रदेशाग्रोंका वर्णन एक स्थितिविशेषमें सामान्य स्थिति और असामान्यस्थितिका निरूपण प्रवाह्यमान और अप्रवाह्यमान उपदेशकी अपेक्षा निर्लेपनस्थानोंका वर्णन ८३८ समयबद्धशेषका एक स्थिति आदिमें ८४१ सम्भव-असम्भवनाका वर्णन सामान्य असामान्य स्थितियोंकी सान्तर कसायपाहुडसुत्त का समाधान क्रोध की प्रथम कृष्टिवे के प्रथम-स्थिति में समयाधिक आवलीकाल शेप रहने तक सम्भव कार्य-विशेपोंका वर्णन कृष्टि के सक्रमण किये जानेवाले प्रदेश की विशेष विधिका निरूपण क्रोधकी द्वितीय कृटिवेदकके प्रथम समयमें शेष ग्यारह सग्रहकृष्टियों की अन्तरकृष्टियों के अल्पबहुत्वका निरुपण समः कृष्टियोंके क्र की द्वितीय कृष्टि वेदकके चरम समयमें होनेवाले स्थितिबन्ध और स्थितिमत्त्वका अल्पबहुत्व ८३१ ८३३ ८४७ निरन्तरताका निर्देश समयप्रवद्ध और भववद्ध प्रदेशाओं के निर्लेपनस्थानों के यवमध्यका वर्णन ८४५ निर्लेपनस्थानोंके अल्पबहुत्वका वर्णन प्रथमसमयवर्ती कृष्टिवेदकके स्थितिसत्त्व और स्थितिबन्धका अल्पबहुत्व कृटिवेटकके मोहनीयके अनुभागकी प्रतिसमय अपवर्तनाका निरूपण क्रोधादिकपायोंके संग्रहकृष्टियोंकी वध्यमान अवध्यमानताका निरूपण पूर्वकृष्टियों के निर्वृत्ति-विपयक शकाओं ८३४ ८४२ ८४६ ८५० ८५१ ८५२ ८५५ ८५६ ८५७ ८५८ मानकी प्रथम कृष्टिके और शेष कृष्टियोंके वेदकके सम्भव कार्य-विशेषोंका वर्णन मायाकी प्रथम कृष्टि और शेष कृष्टियोंके वेदकके सम्भव कार्य-विशेप का निरूपण लोभ की प्रथम कृष्टि और शेष कृष्टियोंके वेदकके सम्भव कार्य-विशेषोंनिरूपण सूक्ष्मसाम्परायिक कृष्टिवेढककी अतरकृष्टियों का अल्पबहुत्व सूक्ष्मसाम्परायिक कृष्टियों में प्रथमादि समय में दिये जानेवाले प्रदेशाग्रकी श्रेणिप्ररूपणा सूक्ष्मसाम्परायिक कृष्टिकारक के कष्टियोंमें दृश्यमान प्रदेशाकी श्रेणि प्ररूपणा प्रथम समयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिकके उत्कर्षण किये जानेवाले प्रदेशाप्रकी श्रेणिप्ररूपणा मोहकर्मके कृष्टिकरण हो जानेपर होने वाले वन्ध, उदद्यादि विषयक शंकाओं का उद्भावन और उनका समाधान ग्रन्थकार द्वारा चरमसमयवर्ती बादरसाम्परायिक और सूक्ष्मसाम्परायिक बंधने वाले कर्मोंका अल्पबहुत्व सूक्ष्मसाम्परायिकके वेदन किये जानेवाले देशघाती और सर्वघाती मति श्रुतज्ञानावरणका निरूपण कृष्टिवेदक क्षपकके शेप कमोंके वेदकअवेदकताका निरूपण कृष्टिकरण कर देनेपर संभव विचारांका निरूपण क्षपकके कृष्टियोंके वेदन-अवेदनसम्वन्धी शंकाओं का ग्रन्थकार के द्वारा उद्भावन और समाधान ८५६ ८६० = ६१ ८६२ ८६५ ८६६ ८७० ८७३ ८७४ ८५५ ८৬9 ८८ ८७६
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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