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________________ कसाय पाहुड सुत्त [ १५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार १२४४. सुहुपसांपराइय किड्डीओ जाओ पढमसमए कदाओ ताओ बहुगाओ । १२४५. विदियसमए अपुन्याओ कीरंति असंखेज्जगुणहीणाओ । १२४६. अनंतरोवणिदर्शनमोहनीय, चारित्रमोहनीय आदि अवान्तर प्रकृतियो में विभाग होता है, तदनुसार मोहनीय कर्मको प्राप्त द्रव्यका आठवाँ भाग संज्वलनक्रोधको मिलता है । पुनः संज्वलनक्रोधका यह आठवा भाग भी उसकी तीनो संग्रहकृष्टियों में विभक्त होता है, अतएव क्रोध की प्रथम - संग्रहकृष्टिका द्रव्य मोहनीय कर्मके सकल द्रव्यकी अपेक्षा चौबीसवाँ भाग पड़ता है । नोकपायका सवरूपसे अवस्थित सर्व द्रव्य भी क्रोधकी इस प्रथम संग्रहकृष्टिमें ही पाया जाता है । उसके साथ इसका द्रव्य मिलानेपर तेरह-बटे चौवीस भाग (३३) हो जाते हैं, अतः क्रोधकी प्रथम संग्रहकृष्टिके अन्तर्गत रहनेवाली अन्तरकृष्टियोका प्रमाण भी उतना ही सिद्ध हुआ | तेरह-बटे चौवीस भाग प्रमाणवाली क्रोधकी प्रथम संग्रहकृष्टि जिस समय क्रोधकी द्वितीय संग्रहकृष्टिमें संक्रमित की, उस समय उसकी अन्तरकृष्टिका प्रमाण चौदह - बटे चौबीस (४) होता है । पुनः क्रोधकी द्वितीय संग्रहकृष्टिको तृतीय संग्रहकृष्टिमे संक्रान्त करनेपर उसका प्रमाण पन्द्रह-बटे चौवीस (२४) होता है । पुनः क्रोधकी तृतीय संग्रहकृष्टिको मानकी प्रथम संग्रहकृष्टिमे संक्रान्त करनेपर उसका प्रमाण सोलह-वढे चौबीस ( ) हो जाता है । इस प्रकार तेरह-वटे चौबीस (३३) भागप्रमाणवाली क्रोधकी प्रथम संग्रहकृष्टिकी अपेक्षा सोलह-वटे चौबीस (३३) भागप्रमाणवाली मानकी प्रथम संग्रहकृष्टिका प्रमाण विशेष अधिक सिद्ध हो जाता है, क्योकि इसमे उसकी अपेक्षा तीन वटे चौबीस (३४) और अधिक मिल गये है । मानके मायाकी प्रथम संग्रहकृष्टिसं संक्रान्त होनेपर उसकी अन्तरकृष्टियोका प्रमाण विशेष अधिक अर्थात् उन्नीस वटे चौवीस ( 28 ) हो जाता है, क्योकि मानकी प्रथम संग्रहकृष्टिकी अपेक्षा मायाकी प्रथम संग्रहकृष्टिमे मानकी द्वितीय, तृतीय संग्रहकृष्टिका एकएक भाग, तथा अपना एक भाग इस प्रकार तीन वटे चौबीस (२) भाग और उसमे मिल जाते है, इस कारण से मायाकी प्रथम संग्रहकृष्टिसम्बन्धी अन्तरकृष्टियोका प्रमाण विशेष अधिक सिद्ध हो जाता है । मायाके संक्रान्त होनेपर लोभकी प्रथम संग्रहकृष्टियोका प्रमाण विशेष अधिक अर्थात् वाईस वटे चौबीस (३) भाग हो जाता है, क्योकि उसमे मायाकी द्वितीय, तृतीय संग्रहकृष्टिका एक-एक भाग, तथा अपना एक भाग, ऐसे तीन भाग और उसमे अधिक बढ़ जाते हैं । जो सूक्ष्मसाम्परायिक कृष्टियॉ प्रथम समयमे की जाती हैं, उनका प्रमाण विशेष अधिक अर्थात् चौवीस- बटे चौवीस (३४) भागप्रमाण हो जाता है, क्योकि उनमे लोभकी द्वितीय और तृतीय संग्रहकृष्टिसम्बन्धी दो भाग और मिल जाते हैं । इस प्रकार से उत्तरोत्तर अधिक होनेवाले इस विशेषका प्रमाण अपने पूर्ववर्ती प्रमाणके संख्यावें भागप्रमित सिद्ध हो जाता है । ८६४ हैं 1 चूर्णिसू०० - प्रथम समयमे जो सूक्ष्मसाम्पायिक कृष्टियों की जाती है, वे बहुत द्वितीय समयमे जो अपूर्वकृष्टियों की जाती हैं, वे असंख्यातगुणी हीन होती है । इस प्रकार
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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