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________________ गा० २०६] चारित्रमोहक्षपक-कृष्टिवेदकक्रिया-निरूपण ८६१ १२१४. सो वि मायाए विदियकिट्टिवेदगो तेणेव विहिणा संपत्तो मायाए विदियकिट्टि वेदयमाणस्स जा पहमट्टिदी तिस्से पढमहिदीए आवलिया समयाहिया सेसा त्ति । १२१५.ताधे द्विदिबंधोवीसं दिवसा देरणा । १२१६.हिदिसंतकम्मं सोलस मासा देसूणा। १२१७. से काले मायाए तदियकिट्टीदो पदेसग्गमोकड्डियूण पहमट्ठिदि करेदि। १२१८. तेणेव विहिणा संपत्तो मायाए तदियकिट्टि वेदगरस पहमद्विदीए समयाहियावलिया सेसा त्ति । १२१९. ताधे मायाए चरिमसमयवेदगो । १२२०. ताधे दोण्हं संजलणाणं द्विदिवंधो अद्धमासो पडिवुण्णो । १२२१. द्विदिसंतकम्ममेकं वस्सं पडिवुण्णं । १२२२. तिण्हं धादिकम्माणं ठिदिबंधो मासपुधत्तं । १२२३. तिण्हं घादिकम्माणं डिदिसंतकम्मं संखेजाणि वस्ससहस्साणि । १२२४. इदरेसि कम्माणं [द्विदिबंधो संखेज्जाणि वस्साणि] हिदिसंतकम्मं असंखेज्जाणि वस्साणि । १२२५. तदो से काले लोभस्स पढमकिट्टीदो पदेसग्गयोकड्डियूण पढमहिदि करेदि । १२२६. तेणेव विहिणा संपत्तो लोभस्स पढमकिट्टि वेदयमाणस्स पढमद्विदीए समयाहियावलिया सेसा ति । १२२७. ताधे लोभसंजलणस्स हिदिबंधो अंतोमुहुत्तं १२२८. हिदिसंतकम्मं पि अंतोमुहुत्तं । १२२९. तिण्हं घादिकम्माणं हिदिबंधो दिवसपुधत्तं । १२३०. सेसाणं कम्माणं वासपुधत्तं । १२३१. धादिकम्माणं द्विदिसंतकम्म द्वितीय कृष्टिको वेदन करनेवालेकी जो प्रथमस्थिति है उस प्रथमस्थितिमे एक समय अधिक आवली शेष रहने तक सर्व कार्य करता हुआ चला जाता है। उस समय दोनो संज्वलनोका स्थितिवन्ध कुछ कम बीस दिवसप्रमाण है। तथा स्थितिसत्त्व कुछ कम सोलह मास है ॥१२१३-१२१६॥ चूर्णिस०-तदनन्तर कालमे मायाकी तृतीय कृष्टिसे प्रदेशाग्रका अपकर्षण करके प्रथम स्थितिको करता है। और उसी ही विधिसे मायाकी तृतीय कृष्टिको वेदन करनेवालेकी प्रथमस्थितिके एक समय अधिक आवली शेप रहने तक सर्व कार्य करता हुआ चला जाता है। तब वह मायाका चरमसमयवेदक होता है। उस समयमें दोनो संज्वलनोका स्थितिबन्ध परिपूर्ण अर्ध मास है। स्थितिसत्त्व परिपूर्ण एक वर्प है। शेष तीनो धातिया कर्मोंका स्थितिवन्ध मासपृथक्त्व तथा स्थितिसत्त्व संख्यात सहस्र वर्ष है। इतर अर्थात् आयुके विना शेप तीन अघातिया कर्मोंका ( स्थितिवन्ध संख्यात वर्प है और ) स्थितिसत्त्व असंख्यात वर्ष है ॥१२१७-१२२४॥ __चूर्णिसू०-तदनन्तर कालमे लोभकी प्रथम संग्रहकृष्टिसे प्रदेशाग्रका अपकर्पण करके प्रथम स्थितिको करता है और उसी ही विधिसे लोभकी प्रथम कृष्टिको वेदन करनेवालेकी प्रथम स्थितिके एक समय अधिक आवली शेप रहने तक सर्व कार्य करता हुआ चला जाता है । उस समय संज्वलन लोभका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त है। तथा स्थितिसत्त्व भी अन्तर्मुहूर्त है। तीनो घातिया कर्मोंका स्थितिवन्ध दिवसपृथक्त्व है। शेष कर्मोंका स्थितिबन्ध वर्षपृथक्त्व
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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