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________________ कसाय पाहुड सुत्त [१५ चारित्रमोह-क्षपणाधिकार १२००. से काले माणस्स विदियकिट्टीदो पदेसग्गयोकड्डियण पढमट्टिदिं करेदि । १२०१. तेणेव विहिणा संपत्तो माणस्स विदियकिट्टि वेदयमाणस्स जा पहमट्ठिदी तिस्से समयाहियावलियसेसा त्ति । १२०२. ताधे संजलणाणं द्विदिवंधो मासो दस च दिवसा देसूणा । १२०३. संतकम्मं दो वस्साणि अट्ठ च मासा देसूणा । १२०४. से काले माणतदियकिट्टीदो पदेसग्गमोकड्डियूण पडयहिदि करेदि । १२०५. तेणेव विहिणा संपत्तो माणस्स तदियकिट्टि वेदयमाणस्स जा पढमद्विदी तिस्से आवलिया समयाहियमेत्ती सेसा त्ति । १२०६. ताधे माणस्स चरिमसमयवेदगो ।' १२०७. ताधे तिण्हं संजलणाणं द्विदिबंधो मासो पडिचुण्णो । १२०८. संतकम्मं वे वस्साणि पडिवुण्णाणि । १२०९. तदो से काले मायाए पढमकिट्टीए पदेसग्गमोकड्डियूण पढमहिदि करेदि । १२१०. तेणेव विहिणा संपत्तो मायापहमकिट्टि वेदयमाणस्स जा पहमट्ठिदी तिस्से समयाहियावलिया सेसा त्ति । १२११. ताधे ठिदिबंधो दोण्हं संजलणाणं पणुवीसं • दिवसा देसणा । १२१२. हिदिसंतकम्मं वस्सम च मासा देसूणा। १२१३. से काले मायाए विदियकिट्टीदो पदेसगमोकड्डियूण पहमट्ठिदि करेदि चूर्णिसू०-तदनन्तर कालमे मानकी द्वितीय संग्रहकृष्टिसे प्रदेशाग्रका अपकर्पण करके प्रथम स्थितिको करता है और उसी ही विधिसे, मानकी द्वितीय कृष्टिको वेदन करनेवालेकी जो प्रथम स्थिति है, उसमे एक समय अधिक आवली शेष रहने तक संप्राप्त होता है, अर्थात् पूर्वोक्त विधिसे सर्व कार्य करता हुआ चला जाता है। उस समय तीनो संज्वलनोंका स्थितिवन्ध एक मास और कुछ कम दश दिवस है। तथा स्थितिसत्त्व दो वर्ष और कुछ कम आठ सास है ।।१२००-१२०३॥ चूर्णिस०-तदनन्तर कालमे मानकी तृतीय कृष्टिसे प्रदेशाग्रका अपकर्पण करके प्रथमस्थितिको करता है। और उसी ही विधिसे मानकी तृतीय कृष्टिको वेदन करनेवालेकी जो प्रथमस्थिति है, उसमे एक समय अधिक आवली शेष रहने तक सर्व कार्य करता हुआ चला जाता है। उस समय वह मानका चरमसमयवेदक होता है। तब तीनो संज्वलनोका स्थितिवन्ध परिपूर्ण एक मास है और स्थितिसत्त्व परिपूर्ण दो वर्ष है ॥१२०४-१२०८॥ __ चूर्णिसू०-तदनन्तर कालमे मायाकी प्रथम कृष्टिसे प्रदेशाग्रका अपकर्षण कर प्रथमस्थितिको करता है और उसी ही विधिसे, मायाकी प्रथमकृष्टिको वेदन करनेवालेकी जो प्रथमस्थिति है, उसमें एक समय अधिक आवली शेष रहने तक सर्व कार्य करता हुआ चला जाता है । उस समय दोनो संज्वलनोका स्थितिबन्ध कुछ कम पच्चीस दिवस है । तथा स्थितिसत्त्व एक वर्प और कुछ कम आठ मास है ॥१२०९-१२१२॥ चर्णिसू०-तदनन्तर कालमें मायाकी द्वितीय कृष्टिसे प्रदेशाग्रका अपकर्षण करके प्रथमस्थितिको करता है । वह मायाकी द्वितीय कृष्टिका वेदक भी उसी ही विधिसे मायाकी .... २
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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